लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही असुरक्षित, फिर कानून बनाने में देरी क्यों?
–जनता की आवाज न्यूज कटनी विशेष
जब-जब किसी लोकतांत्रिक देश में जनता की आवाज दबाने का प्रयास होता है, तब-तब सबसे पहली गाज सच लिखने वाली कलम पर गिरती है। सरकार और जनता के बीच सबसे मजबूत पुल का काम करने वाला 'चौथा स्तंभ'—मीडिया—आज खुद अपने वजूद और सुरक्षा की लड़ाई लड़ रहा है।
ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर शारीरिक हमले, फर्जी मुकदमे, प्रशासनिक उत्पीड़न और डिजिटल ट्रोलिंग की घटनाएं अब आम बात हो गई हैं। इसके बावजूद सवाल जस का तस बना हुआ है: आखिर केंद्र स्तर पर 'पत्रकार सुरक्षा कानून' क्यों नहीं बनाया जा रहा?
क्यों ठंडे बस्ते में है कानून? तीन मुख्य कारण
पत्रकार सुरक्षा कानून की लंबे समय से उठ रही मांग के बावजूद इसे लागू न किए जाने के पीछे मुख्य रूप से तीन पहलू सामने आते हैं:
- 'कानून और व्यवस्था' का तकनीकी पेच: सरकार का तर्क रहा है कि भारतीय संविधान के तहत पुलिस और कानून-व्यवस्था राज्यों का विषय है। ऐसे में केंद्रीय कानून बनाने के बजाय राज्यों को अधिकार दिए गए हैं।
- पत्रकार की स्पष्ट परिभाषा का अभाव: डिजिटल मीडिया, यूट्यूब और सोशल मीडिया के दौर में यह तय करना एक बड़ी चुनौती बन गया है कि कानूनी दायरे में 'पत्रकार' किसे माना जाए और किसे सुरक्षा का हकदार बनाया जाए।
- राजनीतिक और प्रशासनिक अनिच्छा: निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता अक्सर सत्ता, शासन और स्थानीय माफियाओं के लिए असहज करने वाले सवाल खड़े करती है, जिससे इच्छाशक्ति में कमी देखने को मिलती है।
दो राज्यो ने दिखाई राह: क्या बाकी देश में भी संभव है?
ऐसा नहीं है कि यह कानून बनना नामुमकिन है। महाराष्ट्र (2017) और छत्तीसगढ़ (2023) जैसे राज्यों ने अपने स्तर पर पत्रकार सुरक्षा कानून पारित करके यह साबित किया है कि नीयत हो तो रास्ता निकाला जा सकता है। इन कानूनों में पत्रकारों पर हमले को गैर-जमानती अपराध बनाने और जांच के लिए विशेष तंत्र स्थापित करने के प्रावधान किए गए हैं।
महाराष्ट्र 2017
पत्रकारों पर हमला गैर-जमानती अपराध, संपत्ति के नुकसान की भरपाई हमलावर से।
छत्तीसगढ़ 2023
फर्जी मुकदमों से सुरक्षा, शिकायत निवारण समिति का गठन और कड़े दंड के प्रावधान।
क्या कभी बनेगा और लागू होगा राष्ट्रीय कानून?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निम्नलिखित तीन कदम उठाए जाएं, तो देशव्यापी कानून न सिर्फ बन सकता है बल्कि प्रभावी रूप से लागू भी हो सकता है:
- एकजुटता और साझा ड्राफ्ट: देश भर के मीडिया संगठनों को एक मंच पर आकर एक सर्वमान्य प्रारूप तैयार करके सरकार के समक्ष पेश करना होगा।
- डिजिटल युग के अनुकूल ढांचा: मान्यता प्राप्त, गैर-मान्यता प्राप्त, फ्रीलांसर और डिजिटल पत्रकारों को पारदर्शी मानदंडों के तहत सुरक्षा दायरे में शामिल किया जाए।
- त्वरित कार्रवाई व सख्त पेनल्टी: कानून में फर्जी एफआईआर दर्ज कराने वाले अधिकारियों या हमलावरों के खिलाफ तुरंत और सख्त कार्रवाई की गारंटी हो।
निष्कर्ष:
लोकतंत्र की नींव तभी मजबूत रह सकती है जब सच लिखने वाले का हाथ महसूस करे। यदि चौथे स्तंभ को इसी तरह असुरक्षित छोड़ दिया गया, तो जनता का भरोसा शासन-प्रशासन से उठने लगेगा। पत्रकार सुरक्षा कानून कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता की प्राथमिक जरूरत है।


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