स्वार्थ की राजनीति: विकास कार्यों को ढाल बनाकर आदिवासी सरपंच को नीचा दिखाने का घिनौना प्रयास
कैलवारा खुर्द (कटनी)
लोकतंत्र और पंचायती राज व्यवस्था में सरपंच और उपसरपंच को पंचायत के विकास रथ के दो पहिए माना जाता है, जिन्हें कंधे से कंधा मिलाकर गांव की उन्नति के लिए काम करना चाहिए। लेकिन कटनी जिले की ग्राम पंचायत कैलवारा खुर्द में उल्टी गंगा बहती नजर आ रही है। यहाँ अपने निजी स्वार्थों और राजनीतिक कुंठा से ग्रसित होकर उपसरपंच भूषण (भूरा) पाठक द्वारा लगातार वर्तमान आदिवासी सरपंच की छवि धूमिल करने और उन्हें नीचा दिखाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है।
तथ्य बनाम भ्रामक प्रचार: एक छोटे पुलिया विवाद का सच
हाल ही में तथाकथित पत्रकारों और सोशल मीडिया के माध्यम से एक वीडियो वायरल करवाकर गांव के विकास कार्यों पर फर्जी आरोप गढ़े गए। लेकिन जब हमारी टीम ने धरातल पर जाकर सच्चाई की पड़ताल की, तो मामला बिल्कुल अलग निकला:
- पुलिया का निर्माण:
- लगभग 8 से 9 महीने पूर्व महज 20 से 22 हजार रुपये की छोटी लागत से एक पुलिया बनाई गई थी।
- असली वजह:
- किन्हीं असामाजिक/शरारती तत्वों द्वारा पुलिया के मुख्य बहाव पर बड़े पत्थर डाल दिए गए थे, जिससे जल निकासी अवरुद्ध हो गई और पानी सड़क/पुलिया के ऊपर से बहने लगा।
- अस्थायी समाधान:
- जलभराव की स्थिति से निपटने के लिए स्थानीय मोहल्ले वासियों ने समझदारी दिखाते हुए किनारे से एक छोटी सी नाली खोदकर पानी की निकासी कराई।
लेकिन इस साधारण सी बात को तिल का ताड़ बनाकर तथाकथित पत्रकारों के माध्यम से भ्रामक खबरें चलवाई गईं, ताकि एक आदिवासी समाज से आने वाले जनप्रतिनिधि (सरपंच) को अयोग्य ठहराया जा सके।
पूर्व बनाम वर्तमान: किसका विकास कार्य कितना टिकाऊ?
उपसरपंच भूषण भूरा पाठक की धर्मपत्नी माधुरी पाठक इस पंचायत की पूर्व सरपंच रह चुकी हैं। सवाल यह उठता है कि दूसरों के विकास कार्यों पर उंगली उठाने वाले पूर्व जनप्रतिनिधियों का अपना ट्रैक रिकॉर्ड कैसा रहा है?
आदिवासी मोहल्ले में पूर्व कार्यकाल के दौरान बनाया गया रंगमंच आज अपनी बदहाली और घटिया निर्माण सामग्री की गवाही दे रहा है। वहीं दूसरी ओर, वर्तमान आदिवासी सरपंच और पंच नीरज पांडे ने आपसी समन्वय और दूरदर्शिता का परिचय देते हुए सार्वजनिक काली मंदिर परिसर में एक मजबूत और उपयोगी रंगमंच का निर्माण कराया है, जिसकी सराहना आज पूरे गांव में हो रही है।
जनता का सवाल: आखिर क्यों निशाना बन रहे हैं आदिवासी सरपंच?
कैलवारा खुर्द के प्रबुद्ध नागरिकों और ग्रामीणों का कहना है कि जब से पंचायत की कमान एक आदिवासी सरपंच के हाथों में आई है, तब से उपसरपंच और उनके समर्थकों को यह बदलाव रास नहीं आ रहा है।
ग्रामीणों की राय:
"उपसरपंच को सरपंच का सहयोग कर गांव के विकास में हाथ बंटाना चाहिए, लेकिन वे लगातार झूठी शिकायतों और भ्रामक खबरों के जरिये राजनीतिक रंजिश निकालने में लगे हैं। विकास कार्यों की सफाई या मरम्मत कराने के बजाय उस पर राजनीति करना बेहद दुखद है।"
निष्कर्ष और संदेश
कैलवारा खुर्द में चल रहा यह घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि किस तरह पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर एक आदिवासी जनप्रतिनिधि को काम करने से रोका जा रहा है और उनकी उपलब्धियों को दबाने की साजिश रची जा रही है। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन ऐसे भ्रामक प्रचार और झूठी शिकायतें करने वाले तत्वों पर संज्ञान ले, ताकि गांव का वास्तविक विकास बिना किसी राजनीतिक बाधा के निरंतर आगे बढ़ता रहे।

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