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ताले में कैद उम्मीदें: क्या चार साल बाद खुलेगा लाड़ली बहना का पोर्टल, या यह सिर्फ एक सियासी पैंतरा है?
विशेष संवाददाता
भोपाल, मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश की राजनीति में जिस योजना ने सबसे बड़ा भूचाल लाया और सत्ता की चाबी एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी के हाथों में सौंपी, वह थी – 'मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना'। मई 2023 में शुरू हुई इस योजना को राज्य की महिलाओं के लिए एक गेम-चेंजर के रूप में पेश किया गया था। लेकिन इस योजना के साथ एक ऐसा विरोधाभास जुड़ा है जो लोकतंत्र और प्रशासनिक न्याय पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह है कि आखिर जो बहनें शुरुआती दौर में किन्हीं तकनीकी कारणों, दस्तावेजों की कमी या जागरूकता के अभाव के चलते इस दायरे से छूट गईं, उनके लिए इस योजना के दरवाजे हमेशा के लिए बंद क्यों कर दिए गए?
लगभग चार साल का वक्त बीतने को है, और पोर्टल पर लगे ताले जस के तस हैं। क्या शासन कभी इनकी सुध लेगा? क्या छूटे हुए परिवारों के नुकसान की भरपाई संभव है? आइए गहराई से टटोलते हैं इस राजनीतिक और सामाजिक पहेली को।
सवाल नंबर 1: चार साल से पोर्टल पर ताला क्यों? क्या एक बार अंदर होना ही आखिरी रास्ता था?
जब 2023 में यह योजना आई थी, तो युद्ध स्तर पर पंजीयन हुए। लेकिन प्रशासनिक जटिलताओं, समग्र आईडी में नाम की त्रुटि, ई-केवाईसी (e-KYC) की अड़चनों और कई दूर-दराज के इलाकों में सूचना न पहुंच पाने के कारण लाखों पात्र महिलाएं आवेदन करने से वंचित रह गईं।
हैरानी की बात यह है कि इसके बाद शासन ने पोर्टल के गेट पर केवल ताला ही नहीं लगाया, बल्कि जैसे उस पर हमेशा के लिए वेल्डिंग कर दी गई हो। नए आवेदनों के लिए रास्ते पूरी तरह बंद कर दिए गए। प्रशासनिक गलियारों में तर्क दिया जाता है कि वित्तीय संतुलन और बजट के प्रबंधन के लिए दायरा सीमित रखना जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या कल्याणकारी राज्य की परिभाषा में 'वंचितों का छूटना' स्वीकार्य हो सकता है? जो महिलाएं पिछले चार साल से हर महीने मिलने वाली आर्थिक सहायता से वंचित रहीं, उनके लिए यह व्यवस्था एक ऐसा चक्रव्यूह बन गई जिसमें 'एक बार जो अंदर आ गया, सो आ गया; जो बाहर रह गया, वह देखता रह गया।'
सवाल नंबर 2: क्या चुनाव के ठीक पहले फिर इस्तेमाल होगा 'ट्रंप कार्ड'?
राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज है और हाल ही में सरकार के मंत्रियों के बयानों से संकेत भी मिले हैं कि सरकार एक बार फिर से छूटी हुई महिलाओं का आकलन करवा रही है और भविष्य में पोर्टल खोलने पर विचार कर रही है।
लेकिन विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह फैसला महज चुनावी लाभ के लिए उठाया जाने वाला अगला 'ट्रंप कार्ड' है? जब-जब अगला विधानसभा चुनाव नजदीक आएगा, क्या तब-तब इस पोर्टल को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा? यदि सरकार की नीयत सचमुच साफ है और वह महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण के प्रति गंभीर है, तो योजना के दरवाजे बिना किसी राजनीतिक कैलेंडर के, साल के 365 दिन खुले रहने चाहिए। इसे चुनाव जिताऊ टूल बनाने की बजाए एक सतत सामाजिक सुरक्षा कवच क्यों नहीं बनाया जाता?
सवाल नंबर 3: छूटी हुई बहनों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा? क्या जग पाएगी खोई उम्मीद?
सबसे बड़ा और दिल को झकझोर देने वाला सवाल यही है। जिन पात्र महिलाओं ने पिछले चार वर्षों में योजना के तहत लगभग हजारों रुपये की सहायता राशि खो दी, क्या शासन उस वित्तीय और मानसिक नुकसान की भरपाई कर पाएगा?
गरीब परिवारों के लिए यह राशि सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि चूल्हा जलाने, बच्चों की कॉपी-किताब खरीदने और छोटी-मोटी दवाइयों का जरिया होती है। जब एक ही गांव या मोहल्ले की एक महिला को हर महीने पैसे मिलते हैं और उसकी पड़ोसी, जो उतनी ही गरीब और पात्र है, सिर्फ इसलिए खाली हाथ रह जाती है क्योंकि वह 2023 के उस तय समय में पोर्टल पर फॉर्म नहीं भर पाई थी, तो उनके मन में शासन के प्रति उपजा यह हीनभाव और निराशा समाज में एक बड़ी खाई पैदा करता है।
अब भले ही सरकार नए सिरे से सर्वे की बात कर रही हो, लेकिन चार साल की उस लंबी और पीड़ादायक प्रतीक्षा के बाद क्या उन महिलाओं के मन में वैसी ही सच्ची उम्मीद फिर से जग पाएगी? या वे इसे भी महज एक और चुनावी छलावा मानकर चुप हो जाएंगी?
निष्कर्ष: क्या सिर्फ पोर्टल खुलेगा, या न्याय भी मिलेगा?
लाड़ली बहना योजना ने मध्य प्रदेश की महिलाओं को आर्थिक संबल तो दिया है, लेकिन इसके प्रशासनिक स्वरूप की बंदिशें कई सवाल पीछे छोड़ गई हैं। पोर्टल दोबारा खुलने की खबरें उन महिलाओं के लिए एक छोटी सी किरण जरूर लेकर आई हैं जो लंबे समय से आस लगाए बैठी हैं, लेकिन असली परीक्षा इस बात होगी कि क्या सरकार बिना किसी राजनीतिक नफे-नुकसान के गणित के, हर उस पात्र महिला को उसका हक दे पाएगी जो सिस्टम की rigidity (कठोरता) के चलते पीछे छूट गई थी।
वक्त आ गया है कि हुक्मरान यह समझें कि जन कल्याणकारी योजनाएं राजनीतिक सौदेबाजी का जरिया नहीं, बल्कि जनता का अधिकार होती हैं। देखना यह है कि क्या इस बार पोर्टल सचमुच खुलेगा या यह सिर्फ चुनावी हवा का एक और झोका बनकर रह जाएगा।


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