​कटनी का जल क्रांति: सूखी खदानें बनीं 'पानी का किला', गर्मी में जल संकट हुआ दूर

​विशेष रिपोर्ट कटनी

​कटनी। जहाँ हर साल भीषण गर्मी के दस्तक देते ही देश के बड़े-बड़े शहर और ग्रामीण अंचल भीषण जल संकट की चपेट में आ जाते हैं, वहीं मध्यप्रदेश के कटनी जिले ने जल संरक्षण की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा पूरे राज्य में हो रही है। जिले की परित्यक्त (सूखी/खाली) चूना पत्थर खदानों को 'जल संरक्षण के कुंज' में बदलकर प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने शहर को भीषण गर्मी में पानी की किल्लत से पूरी तरह बचा लिया है।

​कैसे काम करता है यह अनूठा 'वॉटर मॉडल'?

​कटनी का यह नवाचार पूरी तरह से प्राकृतिक जल पुनर्भरण (Water Recharge) और जल संग्रहण पर आधारित है:

  • ​अतिरिक्त जल का संचयन: वर्षा ऋतु में कटनी नदी के उफान पर आने वाले अतिरिक्त जल को बर्बाद होने से बचाकर सीधे इन विशाल खदानों की ओर मोड़ दिया जाता है।
  • ​5 प्रमुख खदानों में भंडारण: विश्वकर्मा, कंचन और इमलिया खदान समेत शहर के आसपास मौजूद 5 बड़ी खाली खदानों को विशाल जल भंडार (रिजर्वायर) में बदल दिया गया है।
  • ​फिल्टरेशन और सप्लाई: ग्रीष्मकाल में जब नदियों का जलस्तर गिर जाता है, तब इन खदानों में संग्रहित पानी को अत्याधुनिक फिल्टर प्लांट के जरिए साफ कर पूरे शहर में पेयजल के रूप में सप्लाई किया जाता है।

​परियोजना के प्रमुख बिंदु

​₹2.5 करोड़ की लागत से तैयार हुआ इमलिया प्रोजेक्ट

​यह प्रोजेक्ट स्थानीय विधायक संदीप जायसवाल और जिला प्रशासन के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है। जमीनी स्तर के इस नवाचार ने साबित कर दिया है कि बेहतर प्रबंधन से प्राकृतिक संसाधनों का पुनरुप्रयोग कैसे संभव है।


  • ​40% अधिक जल संग्रहण: पिछले वर्ष की तुलना में इस बार 40% अधिक पानी स्टोर किया गया, जिससे भीषण गर्मी के दिनों में भी शहर की नल-जल योजना निर्बाध रूप से चलती रही।
  • ​कम लागत में बड़ा समाधान: नए डैम या बड़े वाटर बॉडीज बनाने की तुलना में खाली पड़ी खदानों का उपयोग अत्यंत किफायती साबित हुआ।

​पेयजल से आगे: पर्यावरण और भूजल स्तर को नया जीवन

​यह प्रोजेक्ट केवल पीने का पानी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी पर्यावरणीय फायदे भी सामने आ रहे हैं:

  • ​भूजल स्तर (Groundwater Level) में सुधार: विशाल जल निकायों के रूप में मौजूद ये खदानें आसपास के पूरे इलाके में लगातार 'वाटर रिचार्ज' कर रही हैं, जिससे कुओं और बोरवेल का जलस्तर बढ़ा है।
  • ​पर्यावरण संरक्षण: कभी धूल और वीराने से भरी सूखी खदानें अब हरित आवरण और पक्षियों के ठिकाने में बदलने लगी हैं।

​जमीनी नवाचार को प्रशासन की मुहर

​कटनी के इस सफल प्रयोग को राज्य स्तर पर सराहा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि खनन प्रभावित अन्य जिलों के लिए भी यह 'कटनी मॉडल' जल संरक्षण का एक बेहतरीन रोल मॉडल बन सकता है। जल संकट से जूझते भारत के अन्य हिस्सों के लिए कटनी ने यह संदेश दिया है कि समस्या चाहें कितनी भी बड़ी हो, अगर दूरदर्शिता और इच्छाशक्ति हो तो बेकार पड़ी खदानें भी 'पानी का किला' बन सकती हैं।

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