लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही बेसहारा: सवाल यह कि आखिर कब मिलेगा पत्रकारों को कानूनी सुरक्षा कवच?

 लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही बेसहारा: सवाल यह कि आखिर कब मिलेगा पत्रकारों को कानूनी सुरक्षा कवच?

 

फाइल-फोल्डर में कैद 'पत्रकार सुरक्षा कानून'

​ लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही बेसहारा: सवाल यह कि आखिर कब मिलेगा पत्रकारों को कानूनी सुरक्षा कवच?

​1. मसौदे की जमीनी हकीकत: कहां अटका है कानून?

​भारत में पत्रकारों के लिए एक केंद्रीय 'पत्रकार सुरक्षा कानून' (Journalist Protection Act) का मसौदा वर्षों से बहस, याचिकाओं और सरकारी वचनों तक ही सीमित है।

  • ​केंद्रीय स्तर पर स्थिति: केंद्र सरकार के पास वर्तमान में कोई अलग या विशेष 'पत्रकार सुरक्षा अधिनियम' लागू नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकार मुख्य रूप से भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सामान्य श्रम कानूनों के तहत ही आते हैं।

  • ​राज्य स्तर पर प्रयास:
    • ​महाराष्ट्र: महाराष्ट्र देश का पहला ऐसा राज्य बना जिसने 2017 में 'महाराष्ट्र मीडिया पर्सन्स एंड मीडिया इंस्टीट्यूशंस (प्रिवेंशन ऑफ वायलेंस) एक्ट' पारित किया। इसके तहत पत्रकारों पर हमले को गैर-जमानती और दंडनीय अपराध बनाया गया।
    • ​छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ सरकार ने भी 'विशेष पत्रकार सुरक्षा विधेयक' का मसौदा तैयार किया, जो लंबे समय तक प्रक्रियाओं और समीक्षाओं में अटका रहा।
    • ​अन्य राज्य: बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में केवल पुलिस स्तर पर समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं, लेकिन कोई ठोस वैधानिक कानून अब तक लागू नहीं हो सका है।

    है।

    ​2. क्यों नहीं दी जा रही विशेष कानूनी सुरक्षा?

    ​पत्रकारों को अलग से सुरक्षा कानून न दिए जाने के पीछे कई प्रशासनिक, कानूनी और राजनीतिक तर्क दिए जाते हैं:  

  • सुरक्षा न होने के दुष्परिणाम

    ​सुरक्षा कवच के अभाव में देश के पत्रकारों—विशेषकर ग्रामीण और जमीनी स्तर (ग्राउंड रिपोर्टर्स) पर काम करने वालों—को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:

    1. ​शारीरिक हमले और धमकियां: खनन माफिया, भू-माफिया और स्थानीय अपराधियों के खिलाफ रिपोर्टिंग करने पर जानलेवा हमले और हत्या की घटनाएं सामने आती रहती हैं।
    2. ​कानूनी उत्पीड़न (SLAPP Suits): पत्रकारों को चुप कराने के लिए उन पर अक्सर मनगढ़ंत एफआईआर (FIR), मानहानि के मुकदमे या राष्ट्रद्रोह/उपा (UAPA) जैसी सख्त धाराएं लगा दी जाती हैं।
    3. ​आर्थिक व सामाजिक असुरक्षा: गैर-मान्यता प्राप्त और स्ट्रिंगर पत्रकारों को न तो कोई बीमा सुरक्षा मिलती है और न ही विधिक सहायता (Legal Aid)।

    ​4. कब लागू होगा पत्रकार कानून? (आगे का रास्ता)

    ​जब तक संसद द्वारा कोई एकीकृत राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा अधिनियम पारित नहीं किया जाता, तब तक यह कानून पूरे देश में एक साथ लागू नहीं हो सकता। इसके क्रियान्वयन के लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:

    • ​संसद में केंद्रीय विधेयक: प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के सुझावों के आधार पर संसद में एक व्यापक ड्राफ्ट लाया जाए।
    • ​स्पष्ट और समावेशी परिभाषा: डिजिटल, प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और फ्रीलांस रिपोर्टरों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करके दायरे में लाया जाए।
    • ​त्वरित जांच प्रक्रिया: पत्रकार पर हमला होने या शिकायत दर्ज होने पर डीएसपी (DSP) स्तर के अधिकारी द्वारा तय समय-सीमा के भीतर निष्पक्ष जांच का प्रावधान हो।

    • ​फर्जी मुकदमों से सुरक्षा: किसी खबर के कारण एफआईआर दर्ज करने से पहले एक स्वतंत्र नोडल कमेटी (जिसमें प्रेस काउंसिल के प्रतिनिधि शामिल हों) द्वारा समीक्षा अनिवार्य की जाए।

    ​निष्कर्ष: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तब तक मजबूत नहीं हो सकता जब तक उसकी नींव में काम करने वाले पत्रकारों को निर्भीक होकर काम करने का माहौल न मिले। 'पत्रकार सुरक्षा कानून' किसी विशेषाधिकार की मांग नहीं, बल्कि निष्पक्ष पत्रकारिता और जनता के 'सूचना के अधिकार' की रक्षा के लिए एक बुनियादी जरूरत है।



     


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