रेत सप्लाई ठप: थम गए पंचायतों के विकास के पहिए, अटक गईं सरकारी योजनाएं
कटनी/मध्य प्रदेश
कटनी/भोपाल: रेत खदान सप्लायरों और ट्रक ऑपरेटरों की जारी हड़ताल तथा मानसून के कड़े नियमों के चलते राज्य भर में रेत का संकट भयावह रूप ले चुका है। आलम यह है कि गाँव की गलियों से लेकर शहरों के बड़े प्रोजेक्ट्स तक—हर जगह निर्माण कार्य पूरी तरह ठप पड़ गए हैं। पंचायतों में प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत बन रहे गरीबों के मकान, नाली निर्माण, पंचायत भवन और सीसी रोड के काम अचानक रुक गए हैं। ठेकेदार और ग्रामीण मजदूर काम बंद होने से बेराजगार हो गए हैं, वहीं आम नागरिक महंगे दामों में चोरी-छिपे बिक रही बालू खरीदने को मजबूर हैं।
क्यों अड़ा है शासन? क्यों नहीं निकल रहा समाधान?
शासन और सप्लायरों के बीच बातचीत बेनतीजा रहने के मुख्य प्रशासनिक और आर्थिक कारण:
- राजस्व (Revenue) का नुकसान: सप्लायरों की मुख्य मांग रॉयल्टी और स्टैंप ड्यूटी में कटौती की है। सरकार का तर्क है कि रॉयल्टी दरों को कम करने से राज्य के खनिज राजस्व (Mineral Revenue) को भारी नुकसान पहुँचेगा, जिसका असर सीधे बजट पर पड़ेगा।
- एनजीटी (NGT) के सख्त निर्देश: पर्यावरण और नदियों के बचाव के लिए NGT के नियम बेहद सख्त हैं। शासन का कहना है कि मानसून अवधि (15 जून से 1 अक्टूबर) के दौरान नदियों से उत्खनन की अनुमति देना कानूनन संभव नहीं है।
- अवैध उत्खनन पर निगरानी बनाम शिकायतें: शासन ने सैटेलाइट मैपिंग और जियो-टैगिंग की व्यवस्था अवैध खनन रोकने के लिए लागू की है, जबकि सप्लायर इसे तकनीकी खामी बताकर जुर्माना वापस लेने की मांग कर रहे हैं। अधिकारियों का मानना है कि नियमों में ढील देने से अवैध खनन को बढ़ावा मिलेगा।
यदि यही हाल रहा तो..." — विशेषज्ञों की चेतावनी
विकास दर पर ब्रेक: यदि अगले कुछ दिनों में हड़ताल खत्म नहीं हुई और सप्लाई सुचारू नहीं की गई, तो चालू वित्तीय वर्ष के सभी ग्रामीण विकास लक्ष्य बुरी तरह पिछड़ जाएंगे।
मजदूरों का पलायन: काम ठप होने से देहाती क्षेत्रों से दिहाड़ी मजदूरों का बड़े शहरों की ओर पलायन बढ़ सकता है।
ठेकेदारों का हाथ खड़े करना: सामग्री की अनुपलब्धता और बढ़ी हुई दरों के कारण शासकीय ठेकेदार टेंडर की समय-सीमा पूरी करने में असमर्थता जता रहे हैं।
आगे का रास्ता:
शासन को बीच का रास्ता निकालते हुए सप्लायरों के साथ आपातकालीन बैठक बुलानी होगी। ऑनलाइन टीपी पोर्टल की तकनीकी खामियों और चेकपोस्टों पर कथित उत्पीड़न जैसी जायज मांगों का तत्काल निवारण करके ही इस गंतरोध को समाप्त किया जा सकता है, ताकि विकास की गति को फिर से पटरी पर लाया जा सके।

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