शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा
जलाशय और शासकीय भूमि पर जम गया ‘अग्रवाल ढाबा’? प्रशासन की खामोशी पर उठे गंभीर सवाल
पिपरौद मोड़, राष्ट्रीय राजमार्ग
पिपरौद
राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे पिपरौद मोड़ स्थित ‘अग्रवाल ढाबा’ इन दिनों क्षेत्र में चर्चा और विवाद का मुख्य केंद्र बना हुआ है। आरोप है कि यह ढाबा पूर्णतः शासकीय भूमि पर कब्जा करके धड़ल्ले से अपना व्यवसाय संचालित कर रहा है। विभागीय दस्तावेजों और शासकीय अभिलेखों के अनुसार पिपरौद स्थित खसरा क्रमांक 83 पूर्ण रूप से शासकीय भूमि दर्ज है, जो कि मूलतः जलाशय (तालाब/जल संरचना) की भूमि है।
सार्वजनिक एवं पर्यावरणीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण इस शासकीय जमीन पर निजी व्यापार खड़ा कर लिया गया है, लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस स्पष्ट अतिक्रमण पर आज दिनांक तक प्रशासन द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
राजस्व अधिकारियों का ‘आना-जाना और खातिरदारी’?
स्थानीय ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि यह पूरा मामला जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की नजरों के सामने है। पिपरौद मोड़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित होने के कारण यहां से दिन-रात प्रशासनिक गाड़ियों की आवाजाही बनी रहती है।
चर्चा यह भी है कि इस ढाबे पर राजस्व विभाग समेत अन्य प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों का लगातार आना-जाना और खान-पान लगा रहता है। यही वजह है कि आँखों के सामने हो रहे इस बड़े अतिक्रमण पर जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं।
उठते तीखे सवाल:
- किसके संरक्षण में चल रहा कब्जा? सार्वजनिक जलाशय की जमीन पर ढाबा स्थापित करने और व्यापार चलाने की छूट आखिर किसने और किस आधार पर दी?
- कार्रवाई से परहेज क्यों? खसरा क्रमांक 83 का शासकीय रिकॉर्ड में स्पष्ट उल्लेख होने के बाद भी अब तक बेदखली की कार्रवाई या बुलडोजर का रुख इस ओर क्यों नहीं हुआ?
- क्या मिलीभगत का है खेल? क्या क्षेत्र के राजस्व और प्रशासनिक अधिकारियों की मौन सहमति या मिलीभगत के कारण ही यह अवैध कब्जा लगातार फल-फूल रहा है?
पर्यावरण और जनहित को नुकसान
जलाशय या जल निकायों की भूमि पर अतिक्रमण सीधे तौर पर पर्यावरण और प्राकृतिक जलस्रोतों को नुकसान पहुंचाता है। सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के भी सख्त निर्देश हैं कि जल निकायों की जमीनों से तत्काल अतिक्रमण हटाया जाए। इसके बावजूद पिपरौद मोड़ पर नियमों को ताक पर रखकर यह ढाबा संचालित हो रहा है।
आगे क्या?
इस संबंध में जब उच्च अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया, तो कुछ क्षेत्रवासियों में भारी आक्रोश देखने को मिला। अब देखना यह होगा कि इस समाचार के प्रकाशन के बाद संबंधित जिला प्रशासन और राजस्व विभाग नींद से जागता है या फिर ‘खातिरदारी’ के खेल में शासकीय भूमि पर यह कब्जा यूं ही बरकरार रहेगा।

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