कटनी आबकारी विभाग में ट्रांसफर पॉलिसी को ठेंगा, वर्षों से जमे बाबुओं पर मेहरबान कौन?
कटनी
कटनी। मध्य प्रदेश शासन की ट्रांसफर पॉलिसी के तहत कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए हर 3 से 5 साल में सरकारी कर्मचारियों का तबादला अनिवार्य माना गया है। लेकिन, कटनी जिले का आबकारी विभाग शायद इस शासकीय नियम से पूरी तरह अछूता है। यहाँ पदस्थ कुछ बाबू और कर्मचारी इतने लंबे समय से एक ही कुर्सी पर जमे हुए हैं कि अब उनकी जड़ें विभाग में बरगद के पेड़ से भी गहरी हो चुकी हैं।
अनुभव या 'लूपहोल्स' का ज्ञान?
सालों से एक ही दफ्तर में जमे रहने के कारण इन कर्मचारियों को विभाग की हर बारीक से बारीक जानकारी और सिस्टम के हर 'लूपहोल' (खामी) का पूरा ज्ञान हो चुका है। विभागीय सूत्रों की मानें तो यही वह ज्ञान है, जिसका इस्तेमाल नियम-कानून को अपनी सुविधानुसार मोड़ने के लिए किया जा रहा है। लंबे समय तक एक ही जगह टिके रहने से जो एकाधिकार (Monopoly) और भ्रष्टाचार पनपता है, उसे रोकने के लिए ही ट्रांसफर पॉलिसी बनाई गई थी। लेकिन कटनी आबकारी विभाग में यह नीति महज़ कागजों तक सिमट कर रह गई है।
शासन के नियमों की खुलेआम अनदेखी
शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि एक ही स्थान पर 3 साल या अधिकतम 5 साल पूरे करने के बाद अधिकारी या कर्मचारी का स्थानांतरण कर दिया जाना चाहिए। यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। तो फिर कटनी आबकारी विभाग में यह नियम लागू क्यों नहीं होता? आखिर वह कौन सी अदृश्य शक्ति है जो इन बाबुओं की तबादले की फाइलों को हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में डाल देती है?
"जब पूरे प्रदेश में कर्मचारियों के तबादले शासकीय नीतियों के तहत हो रहे हैं, तो कटनी आबकारी विभाग के ये कर्मचारी किस 'वीआईपी' श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपनी मनपसंद जगह से हटना ही नहीं पड़ता?"
क्या है राजनीतिक संरक्षण का खेल?
शहर के चौराहों से लेकर दफ्तरों के गलियारों तक अब यह सवाल गूंज रहा है कि आखिर इन कर्मचारियों को किसका राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है? क्या किसी रसूखदार सफेदपोश नेता का हाथ इन कर्मचारियों के सिर पर है? यह संदेह इसलिए भी गहरा जाता है क्योंकि वरिष्ठ अधिकारी भी इन कर्मचारियों को हटाने या इनकी जगह बदलने में दिलचस्पी नहीं दिखाते। बिना किसी बड़े राजनीतिक दबाव या संरक्षण के, वर्षों तक ट्रांसफर पॉलिसी को धता बताना किसी भी आम कर्मचारी के बस की बात नहीं है।
अब उठ रहे हैं ये बड़े सवाल:
- कटनी आबकारी विभाग में 5 वर्ष से अधिक समय से जमे कर्मचारियों की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
- स्थानांतरण नीति का पालन सुनिश्चित कराने वाले उच्चाधिकारी इस मामले में मौन क्यों हैं?
- क्या सत्ताधारी नेताओं के दबाव में प्रशासन इन बाबुओं को हटाने से कतरा रहा है?
आगे क्या?
सवाल सिर्फ एक दफ्तर का नहीं, बल्कि सिस्टम पर उठते भरोसे का है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या जिला प्रशासन, कलेक्टर महोदय या राज्य सरकार का आबकारी मुख्यालय इस मामले में कोई संज्ञान लेता है? या फिर कटनी का यह आबकारी विभाग अपने इन 'विशेषाधिकार प्राप्त' बाबुओं के सहारे ही चलता रहेगा?
आम जनता और निष्पक्षता की उम्मीद रखने वाले अन्य कर्मचारियों को अब जवाब और कार्रवाई दोनों का इंतजार है।
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