कैलवारा खुर्द में मिड-डे मील पर 'पूर्व सरपंच पति' का कब्जा?
स्कूलों और आंगनवाड़ियों में राशन गायब, पूर्व सरपंच के घर से बंटता है 'आधा किलो आलू और एक पाव तेल'
शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे गंभीर सवाल, बच्चों के पोषण आहार पर आखिर किसका एकाधिकार?
कैलवारा खुर्द /कटनी
शासकीय प्राथमिक शाला कैलवारा खुर्द और झुरही आंगनवाड़ी केंद्र सहित संपूर्ण ग्राम पंचायत कैलवारा खुर्द में बच्चों को मिलने वाले 'मिड-डे मील' (एमडीएम) को लेकर एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, यहाँ शासन की महत्वपूर्ण मध्याह्न भोजन योजना पर पूर्व सरपंच माधुरी भूषण पाठक के पति भूषण पाठक का पूरी तरह से एकाधिकार बना हुआ है।
न स्कूल में राशन, न आंगनवाड़ी में भंडारण
नियमों के मुताबिक, मध्याह्न भोजन का राशन (अनाज, तेल, मसाले व सब्जियां) संबंधित शाला या आंगनवाड़ी परिसर में स्थित किचन शेड या निर्धारित स्थान पर भंडारित होना चाहिए। लेकिन कैलवारा खुर्द की जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट बताई जा रही है।
- किचन शेड खाली: स्कूलों और आंगनवाड़ियों में किसी भी तरह का किराना या राशन सामग्री नहीं रखी जाती।
- निजी मकान बना मुख्य गढ़: योजना का पूरा राशन और सामग्री पूर्व सरपंच के निजी घर पर रखी जाती है।
- राशन की 'दैनिक नाप-तोल': खाना बनाने वाले रसोइयों को रोजाना पूर्व सरपंच के घर से ही सीमित मात्रा में—जैसे आधा-एक किलो आलू, टमाटर, बैंगन और महज एक पाव (250 ग्राम) तेल—सप्लाई किया जाता है।
पोषण के नाम पर खिलवाड़ और नियमों की अनदेखी
शासकीय दिशानिर्देशों के तहत बच्चों को तय मानक के अनुसार पौष्टिक और संतुलित भोजन मिलना अनिवार्य है। लेकिन जब राशन सामग्री ही किसी निजी व्यक्ति के नियंत्रण में हो और दैनिक आधार पर 'माप-तौल' कर दी जा रही हो, तो भोजन की गुणवत्ता और बच्चों के पोषण पर सीधा असर पड़ना स्वाभाविक है।
बड़ा सवाल: आखिर किस अधिकार और हैसियत से एक पूर्व प्रतिनिधि का परिवार शासकीय योजना के राशन का अपनी मर्जी से वितरण कर रहा है? क्या यह बच्चों के निवाले पर सीधे तौर पर हक मारने जैसा नहीं है?
विभाग और प्रशासन की चुप्पी बनी संदेहास्पद
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था पर खड़ा होता है:
- बीआरसी (BRC) और संकुल समन्वयकों की भूमिका: क्या अधिकारियों ने कभी इन प्राथमिक शालाओं और आंगनवाड़ियों का औचक निरीक्षण नहीं किया?
- शिक्षा विभाग की अनदेखी: जब परिसर में राशन का नामो-निशान तक नहीं होता, तो अधिकारियों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी?
- निगरानी समिति निष्प्रभावी: शाला प्रबंधन समिति (SMC) और स्थानीय ग्रामीण इस मनमानी पर खामोश क्यों हैं?
निष्पक्ष जांच की मांग
ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि यह केवल अव्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि शासकीय संसाधनों के निजी इस्तेमाल और मनमानी का गंभीर उदाहरण है। यदि जल्द ही शिक्षा विभाग, विकासखंड स्रोत समन्वयक (BRC) और जिला प्रशासन ने इस मामले का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच नहीं कराई, तो बच्चों के भविष्य और उनके अधिकार के लिए यह एक बड़ा कुठाराघात होगा।
अब देखना यह होगा कि इस खुलासे के बाद जिम्मेदार अधिकारी नींद से जागते हैं या फिर कैलवारा खुर्द में मिड-डे मील पर यह निजी एकाधिकार यूँ ही कायम रहता है।

Comments
Post a Comment