आखिर क्यों कड़वी हो रही चीनी की मिठास?एथेनॉल की ‘दौड़’ और चीनी की ‘तंगी’: क्या गन्ने के डायवर्जन से लगी महंगाई की आग?
विशेष रिपोर्ट
देशभर में चीनी की खुदरा कीमतें पिछले 15 से 20 दिनों में 45-48 रुपये से उछलकर 60 से 65 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुकी हैं। आगामी त्योहारों के सीजन से ठीक पहले रसोई के बजट पर पड़ा यह बोझ अब एक बड़े आर्थिक और नीतिगत संकट का रूप ले चुका है। आम जनता से लेकर बाजार विश्लेषकों तक सब यही सवाल पूछ रहे हैं—आखिर चीनी इतनी महंगी क्यों हो रही है? क्या पेट्रोल में मिलाए जाने वाले एथेनॉल के चक्कर में गन्ने का संकट खड़ा हो गया है?
1. गन्ने का डायवर्जन: असली वजह क्या है?
हाँ, आपकी आशंका बिल्कुल सटीक है। चीनी की बढ़ती कीमतों के पीछे सबसे मुख्य कारण गन्ने का एथेनॉल उत्पादन की ओर भारी डायवर्जन (Diversion) है।
- E20 पेट्रोल का लक्ष्य: सरकार ने देश को कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है।
- गन्ने के रस और सिरप का इस्तेमाल: एथेनॉल बनाने के लिए चीनी मिलों और डिस्टिलरीज ने गन्ने के रस (Sugarcane Juice) और बी-हैवी मोलासेस का सीधा इस्तेमाल बढ़ा दिया।
- मिलों के पास कम चीनी क्षमता: जिस गन्ने से चीनी बननी थी, उसका एक बड़ा हिस्सा सीधे ईंधन (एथेनॉल) बनाने में चला गया। परिणामस्वरूप, चीनी मिलों के पास पेराई के लिए गन्ना तो आया, लेकिन उससे तैयार होने वाली चीनी की कुल मात्रा कम हो गई (लगभग 30 से 35 लाख टन चीनी का डायवर्जन एथेनॉल में हुआ)।
2. आपूर्ति घटी और जमाखोरी/सट्टेबाजी बढ़ी
केवल एथेनॉल ही नहीं, चीनी के इस भाव सुधार और उछाल के पीछे कुछ और कारक भी शामिल हैं:
- उत्तर प्रदेश में गन्ने की बीमारी: देश के सबसे बड़े उत्पादक राज्यों में से एक, उत्तर प्रदेश में रेड रॉट (Red Rot) जैसी फसल बीमारियों और असमान मानसून के कारण गन्ने में सुक्रोज (शर्करा) की रिकवरी घटी है।
- त्योहारी मांग और पैनिक बाइंग: रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, दिवाली जैसे त्योहारों के करीब आते ही बाजार में व्यापारियों द्वारा पैनिक बाइंग (घबराहट में खरीदारी) और जमाखोरी (Hoarding) ने कीमतों को और हवा दी।
3. सरकार का एक्शन: आयात और स्टॉक लिमिट
बढ़ती कीमतों और विपक्ष के चौतरफा हमलों के बाद केंद्र सरकार तुरंत एक्शन मोड में आ गई है:
- ज़ीरो ड्यूटी चीनी आयात: सरकार ने 10 लाख टन तक कच्ची चीनी (Raw Sugar) के बिना किसी सीमा शुल्क (Zero-Duty Import) के आयात को हरी झंडी दे दी है ताकि घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाई जा सके।
- स्टॉक लिमिट लागू: थोक व्यापारियों और बड़े विक्रेताओं पर चीनी के बफर स्टॉक रखने की कड़ी सीमा तय कर दी गई है।
- एथेनॉल पॉलिसी की समीक्षा: आने वाले समय में एथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट किए जाने वाले गन्ने की सीमा घटाकर चीनी उत्पादन को प्राथमिकता देने पर नीतिगत विचार किया जा रहा है।
निष्कर्ष (पॉलिसी का दोहावा मोड़)
भारत के सामने इस वक्त ‘फ्यूल सिक्योरिटी बनाम फूड सिक्योरिटी’ (ईंधन सुरक्षा बनाम खाद्य सुरक्षा) का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। एक तरफ विदेशी मुद्रा बचाने के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग जरूरी है, तो दूसरी तरफ आम आदमी की थाली और चाय की मिठास बनाए रखना भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि नई फसल की पेराई समय से शुरू नहीं होती या आयातित चीनी जल्द बाजार में नहीं पहुँचती, तो आने वाले त्योहारी सीजन में मिठास और कड़वी हो सकती है।

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