कानून की चौखट पर 'समानता' का सवाल—वीआईपी ट्रीटमेंट बनाम आम अपराधी
कटनी
'कानून के सामने सब बराबर हैं'— यह भारतीय संविधान की वह बुनियादी आत्मा है, जिस पर देश की न्याय प्रणाली टिकी है। लेकिन जब धरातल पर इस समानता में अंतर दिखाई देता है, तो जनता के मन में व्यवस्था के प्रति असंतोष और आक्रोश का पनपना स्वाभाविक है। हाल ही में सोशल मीडिया और जनमानस के बीच एक तस्वीर ने इस बहस को एक बार फिर हवा दे दी है कि क्या सचमुच अपराध का कोई 'स्टेटस' होता है?
दो तस्वीरें, दो रवैये: एक तुलनात्मक अध्ययन
वायरल हो रही तस्वीरों में साफ तौर पर दो अलग-अलग व्यवस्थाएं देखने को मिल रही हैं, जो पुलिस और कानून की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती हैं:
- पहला पहलू (सफेदपोश संरक्षण): बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के भाई शालिग्राम गर्ग पर जब आपराधिक आरोप लगे, तो उन्हें पुलिस अभिरक्षा या कोर्ट ले जाते समय एक कार में बैठाया गया। आम जनता का आरोप है कि रसूख और प्रभाव के कारण आरोपियों को कथित तौर पर 'वीआईपी ट्रीटमेंट' दिया जाता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि कानून का हाथ रसूखदारों के सामने ढीला पड़ जाता है।
- दूसरा पहलू (आम अपराधियों का जुलूस): इसके ठीक विपरीत, जब किसी आम पृष्ठभूमि के अपराधी या संदिग्ध को पकड़ा जाता है, तो पुलिस अक्सर उन्हें सड़कों पर पैदल चलाती है, कभी-कभी उन पर लाठियां बरसती हैं और उनका सार्वजनिक जुलूस निकाला जाता है।
- किसी भी आरोपी के साथ उसकी सामाजिक या राजनीतिक हैसियत देखकर व्यवहार न किया जाए।
- चाहे वीआईपी का संबंधी हो या आम नागरिक, यदि वह कानून की नजर में दोषी या संदिग्ध है, तो उसके साथ न्यायसंगत और एक जैसी कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
जनता का सवाल: यदि अपराध समान रूप से गंभीर है, तो अपराधियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार में यह दोहरा पैमाना क्यों?
समानता का सिद्धांत और जनता का आक्रोश
न्याय का मूल सिद्धांत कहता है कि जो पूजनीय हैं या जिन्होंने समाज में सकारात्मक काम किया है, उनका सम्मान अपनी जगह है। लेकिन जब बात कानून के उल्लंघन की आती है, तो अपराधी केवल एक अपराधी होता है। उसका किसी बड़े नाम या संस्थान से जुड़ा होना उसे विशेष रियायत पाने का हकदार नहीं बनाता।
जब आम जनता यह देखती है कि एक प्रभावशाली व्यक्ति के भाई या रिश्तेदार को पुलिस सुरक्षात्मक माहौल में ले जा रही है और एक गरीब या आम व्यक्ति के साथ अमानवीय व्यवहार हो रहा है, तो इससे न्यायपालिका और कार्यपालिका (पुलिस) की विश्वसनीयता पर गहरा आघात लगता है। यह दोहरा मापदंड समाज में एक खतरनाक संदेश भेजता है कि 'कानून केवल कमजोरों के लिए है'।
निष्कर्ष: सुधार की आवश्यकता
लोकतंत्र में कानून का इकबाल तभी तक कायम रहता है जब तक जनता का उसमें अटूट विश्वास हो। पुलिस प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि:
जब तक यह दोहरा मापदंड खत्म नहीं होगा, तब तक न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी का सही अर्थ सिद्ध नहीं हो पाएगा। अपराधियों के साथ कानून के दायरे में रहकर सख्त और एक समान सलूक ही जनता के आक्रोश को शांत कर सकता है।

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