प्रकृति का प्रहार: निगम के 'लाखों' बहे पानी में, जलकुंभी साफ
कटनी
कटनी नगर निगम के "लाखों वाले सफाई अभियान" को पहली ही बारिश ने आइना दिखा दिया है। जिस जलकुंभी को हटाने के लिए निगम प्रशासन ने हफ्तों तक खूब ढिंढोरा पीटा, भारी-भरकम बजट के दावे किए और बाहरी मशीनें मंगवाने का दम भरा, उसे मानसून की पहली तेज बौछार ने महज कुछ घंटों में साफ कर दिया। प्रकृति ने मुफ्त में वो काम कर दिखाया जिसके लिए निगम ने जनता की गाढ़ी कमाई का लाखों रुपया पानी की तरह बहा दिया।
भारी-भरकम दावे, जमीन पर 'सिफर'
पिछले कई दिनों से कटनी नदी के जीर्णोद्धार और उसे जलकुंभी मुक्त बनाने के नाम पर नगर निगम में भारी हलचल थी। बकायदा अधिकारियों के दौरे हो रहे थे, बयानों की झड़ी लगी थी और दावा किया जा रहा था कि आधुनिक तकनीकों और बाहरी मशीनों के जरिए नदी को नया जीवन दिया जाएगा। इस पूरी कागजी और प्रचार वाली कवायद में लाखों रुपए का इन्वेस्टमेंट (खर्च) भी दिखा दिया गया।
लेकिन कल रात हुई झमाझम बारिश ने पूरे खेल की पोल खोल कर रख दी। नदी का जलस्तर जैसे ही बढ़ा, पानी के तेज बहाव ने पूरी की पूरी जलकुंभी को अपने साथ बहा दिया। आज सुबह जब शहरवासी नदी किनारे पहुंचे, तो नजारा बदला हुआ था—नदी खुद-ब-खुद साफ हो चुकी थी।
मशीनें धरी रह गईं, प्रकृति ने दिखाया दम
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि इंसान की तकनीक और नीतियां चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, वह कभी भी प्रकृति से ज्यादा ताकतवर नहीं हो सकता।
बड़ा सवाल: जब हर साल मानसून के शुरुआती बहाव में जलकुंभी का बह जाना तय होता है, तो ऐन बारिश से ठीक पहले लाखों रुपए की इस सफाई का औचित्य क्या था? क्या यह सिर्फ बजट को ठिकाने लगाने की 'क्रोनोलॉजी' थी?
जनता में आक्रोश, उठ रहे हैं तीखे सवाल
नदी की यह "नेचुरल क्लीनिंग" अब शहर में चर्चा का विषय बन गई है। सोशल मीडिया से लेकर चाय की टपरियों तक लोग निगम की कार्यप्रणाली पर तंज कस रहे हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि:
- जो काम प्रकृति को मुफ्त में करना था, उसके लिए भारी मशीनरी का नाटक क्यों किया गया?
- क्या कागजों पर खर्च हुए लाखों रुपयों की अब निष्पक्ष जांच होगी?
फिलहाल, कटनी नदी अब साफ है और कल तक सफाई का क्रेडिट लेने को आतुर नगर निगम के अधिकारी अब इस कुदरती चमत्कार पर चुप्पी साधे हुए हैं।

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