करोड़ों का बजट फिर भी 'गड्ढा युक्त' सड़कें, लाखों में पंचायत की राहों से 'अमरता' की उम्मीद; विकास विभागों का यह दोहरा मापदंड क्यों?
विशेष रिपोर्ट —
देश/प्रदेश: जब बात सड़कों के निर्माण और उनके टिकाऊपन की आती है, तो हमारे देश की व्यवस्था में एक हैरान करने वाला विरोधाभास देखने को मिलता है। एक तरफ लोक निर्माण विभाग (PWD), नगर निगम और अन्य बड़े विकास विभाग हैं, जिनके पास सड़कों के लिए करोड़ों रुपये का भारी-भरकम बजट होता है। दूसरी तरफ हमारी ग्राम पंचायतें हैं, जिन्हें चंद लाख रुपयों के बजट में गांवों की तकदीर बदलने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है।
लेकिन असली खेल बजट का नहीं, बल्कि व्यवस्था के 'दोगले रवैये' और 'जांच के पैमानों' का है। करोड़ों की लागत से बनी चमचमाती हाईवे और मुख्य सड़कें महज छह महीने या एक साल में ही दम तोड़ देती हैं, जबकि चंद लाख में बनी पंचायत की सड़कों से शासन-प्रशासन ऐसी उम्मीद लगाए बैठा है जैसे वे सदियों तक अमर रहेंगी।
करोड़ों का बजट, छह महीने की उम्र: आखिर PWD की जवाबदेही कहां?
शहरों और मुख्य मार्गों को जोड़ने वाली पीडब्ल्यूडी और नगर निगम की सड़कों का बजट करोड़ों में होता है। जनता के टैक्स का पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। आधुनिक तकनीक, बड़े-बड़े ठेकेदार और डिग्रियों से लैस इंजीनियर्स की फौज इस काम में लगती है।
लेकिन नतीजा क्या निकलता है? पहली ही बारिश में इन वीआईपी सड़कों के परखच्चे उड़ जाते हैं। सड़कें धंस जाती हैं, बड़े-बड़े गड्ढे राहगीरों की जान के दुश्मन बन जाते हैं और गिट्टियां बिखरने लगती हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इन बड़ी परियोजनाओं में तकनीकी खामियां निकालने के लिए जिम्मेदार इंजीनियर्स और अधिकारी रहस्यमयी चुप्पी साध लेते हैं। करोड़ों रुपये स्वाहा होने के बाद भी न तो किसी ठेकेदार पर कड़ी कार्रवाई होती है और न ही किसी बड़े अधिकारी की जवाबदेही तय की जाती है।
लाखों का बजट, सौ कमियां: पंचायत की सड़कों पर 'अति-सक्रिय' तंत्र
इसके ठीक विपरीत, अगर ग्रामीण क्षेत्रों का रुख करें तो तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई देती है। ग्राम पंचायतों को मिलने वाला बजट महज दो-चार लाख रुपये का होता है। इस सीमित बजट में पंचायत को न सिर्फ सड़क बनानी होती है, बल्कि गांव की अन्य बुनियादी जरूरतों को भी देखना होता है।
परंतु, जैसे ही पंचायत स्तर पर कोई निर्माण कार्य शुरू होता है, प्रशासनिक अमला और तकनीकी इंजीनियर्स अचानक 'अति-सक्रिय' हो जाते हैं।
- चंद लाख की इंटरलॉकिंग या सीसी रोड में दर्जनों कमियां ढूंढ निकाली जाती हैं।
- मानकों का ऐसा कड़ा पाठ पढ़ाया जाता है, मानो वह सड़क अंतरिक्ष यान उतारने के लिए बनाई जा रही हो।
- पंचायत की सड़कों से यह उम्मीद की जाती है कि वे बिना किसी मरम्मत के अगले 15 से 20 साल तक टस से मस न हों।
- समान जवाबदेही: पीडब्ल्यूडी और नगर निगम की सड़कों के लिए भी 'जवाबदेही अवधि' को कड़ाई से लागू किया जाए। अगर सड़क साल भर में टूटती है, तो संबंधित इंजीनियर और ठेकेदार की संपत्ति से रिकवरी होनी चाहिए।
- जांच के पैमाने एक हों: तकनीकी जांच का पैमाना बजट देखकर नहीं, बल्कि निर्माण की गुणवत्ता देखकर तय होना चाहिए।
- ग्रामीण बजट का सम्मान: पंचायतों को हतोत्साहित करने के बजाय, कम बजट में बेहतर काम करने के लिए उनका सहयोग किया जाना चाहिए, न कि बेवजह की कमियां निकालकर विकास कार्यों को बाधित किया जाए।
बड़ा सवाल: जो इंजीनियर करोड़ों की सड़क धंसने पर अपनी आंखें मूंद लेते हैं, वही चंद लाख की पंचायत स्तरीय सड़क पर इतनी "कहानियां" और "खामियां" क्यों निकालने लगते हैं?
यह भेदभाव सिर्फ तकनीकी नहीं, नीतिगत है
जानकारों की मानें तो यह सीधा-सीधा भेदभाव और दोहरी मानसिकता का नतीजा है। बड़े विभागों के बड़े ठेकेदारों और रसूखदार लोगों के सामने प्रशासनिक तंत्र घुटने टेक देता है। वहां 'कमीशनखोरी' और 'नेक्सस' के चलते घटिया निर्माण को भी हरी झंडी दे दी जाती है।
वहीं, ग्राम पंचायतों के प्रधानों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। कागजी औपचारिकताएं और जांच की तलवार सिर्फ ग्रामीण विकास के बजट पर ही क्यों लटकती है, यह अपने आप में एक बड़ा यक्ष प्रश्न है।
शासन-प्रशासन को देना होगा ध्यान
यदि वास्तव में देश का बुनियादी ढांचा मजबूत करना है, तो शासन और उच्च प्रशासन को इस गंभीर विसंगति पर ध्यान देना होगा:
निष्कर्ष:
सड़कों पर उड़ती धूल और यह गड्ढे सिर्फ डामर के टूटने की कहानी नहीं कह रहे, बल्कि यह हमारे सिस्टम के खोखलेपन और भेदभाव को उजागर कर रहे हैं। वक्त आ गया है कि जनता के पैसे की पाई-पाई का हिसाब बड़े विभागों से भी उसी कड़ाई से लिया जाए, जैसा पंचायतों से लिया जाता है।
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