कटनी RTO में ‘जय-वीरू’ का राज! सरकारी दफ्तर में प्राइवेट दिग्गजों के इशारे पर हो रहा खेल?
विशेष खोजी रिपोर्ट
कटनी। सरकारी महकमों में नियमों को ताक पर रखकर निजी लोगों को तरजीह देना कोई नई बात नहीं है, लेकिन कटनी क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) में इन दिनों जो नजारा है, उसने प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। 'विश्वसनीय सूत्रों' से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, कटनी RTO विभाग में इन दिनों 'जय' और 'वीरू' (बदला हुआ नाम) नामक दो निजी व्यक्तियों का प्रभाव इस कदर बढ़ गया है कि पूरा दफ्तर कथित तौर पर इनके ही इशारे पर चल रहा है।
चौंकाने वाली बात यह है कि शासकीय सेवा से दूर-दूर तक कोई नाता न होने के बावजूद, RTO कार्यालय के भीतर होने वाले हर प्रकार के कथित 'अवैध लेनदेन' और फाइलों की आवाजाही की कहानी इन्हीं दो चेहरों से शुरू और इन्हीं पर खत्म होती है।
बिना 'जय-वीरू' की मर्जी के पत्ता भी नहीं हिलता!
सूत्रों का दावा है कि कटनी RTO में वाहनों के फिटनेस प्रमाण पत्र, परमिट, रजिस्ट्रेशन से लेकर चेकिंग के दौरान होने वाली हर छोटी-बड़ी कार्रवाई के पीछे कहीं न कहीं यही 'जय और वीरू' की जोड़ी जिम्मेदार होती है। आम जनता हो या कोई ट्रांसपोर्टर, यदि उसे RTO से जुड़ा कोई काम करवाना है, तो उसे सीधे या परोक्ष रूप से इन्हीं दो प्राइवेट व्यक्तियों के 'सिस्टम' से होकर गुजरना पड़ता है। सवाल यह उठता है कि जो काम पूरी तरह से पारदर्शी और डिजिटल होना चाहिए, वहां इन निजी दलालों या बिचौलियों को इतनी खुली छूट क्यों दी गई है?
बड़ा सवाल: आरटीओ संतोष पाल की मेहरबानी क्यों?
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर और यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि कटनी जिले के RTO संतोष पाल आखिर इन दोनों निजी व्यक्तियों पर इतना अंधविश्वास क्यों जताते हैं?
जनता पूछती है सवाल:
जब 'जय' और 'वीरू' शासकीय आरटीओ विभाग के किसी भी पद पर पदस्थ नहीं हैं, न ही वे कोई अधिकृत कर्मचारी हैं, तो फिर आरटीओ के हर महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामलों में उनकी भूमिका इतनी 'अहम' कैसे हो गई? आखिर ऐसी क्या मजबूरी या सांठगांठ है कि सरकारी अधिकारी को इन प्राइवेट चेहरों का सहारा लेना पड़ रहा है?
नियम-कायदों की उड़ रही धज्जियां
नियमानुसार किसी भी सरकारी कार्यालय में बाहरी या निजी व्यक्तियों द्वारा शासकीय दस्तावेजों को छूना या विभागीय प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करना पूरी तरह प्रतिबंधित और दंडनीय है। लेकिन कटनी RTO में यह नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित नजर आते हैं। इस कथित 'जय-वीरू' सिंडिकेट के कारण न सिर्फ सरकार के राजस्व को चूना लगने की आशंका बनी रहती है, बल्कि विभाग की साख पर भी गहरा बट्टा लग रहा है।
स्थानीय नागरिकों और सजग समाजसेवियों ने मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। यदि शासकीय कार्यालय में वाकई प्राइवेट लोग ही सर्वेसर्वा बने हुए हैं, तो वरिष्ठ अधिकारियों को इस पर तत्काल संज्ञान लेकर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करनी चाहिए ताकि कटनी RTO को 'निजी हाथों की कठपुतली' बनने से बचाया जा सके।

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