जन सुनवाई का सच
बड़े-बड़े दावों के पीछे 'मौन' प्रशासन: आवेदनों की गिनती तो छपती है, पर संतुष्टि का हिसाब कहाँ है?
कटनी
हर मंगलवार को जिला कलेक्टरेट और प्रशासनिक दफ्तरों के बाहर फरियादियों की लंबी कतारें दिखना आम बात हो गई है। अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बड़े-बड़े अक्षरों में चिल्लाती हैं—"जन सुनवाई में आए 500 आवेदन, कलेक्टर ने दिए तुरंत निराकरण के निर्देश।" लेकिन इन चमचमाती हेडलाइंस के पीछे एक बड़ा और कड़वा सवाल सालों से दफन है: इनमें से वास्तव में कितने आवेदनों का निराकरण संतुष्टिपूर्ण तरीके से हुआ? इसकी रिपोर्ट जनता के सामने क्यों नहीं आती?
पूरी व्यवस्था केवल 'आंकड़ों के खेल' तक सिमट कर रह गई है। प्रशासन इस बात का ढिंढोरा पीटने में तो बहुत आगे रहता है कि उसने कितने लोगों को सुना, लेकिन इस बात पर चुप्पी साध लेता है कि कितने लोगों की समस्या वाकई हल हुई।
'कागजी' निराकरण और जनता की हताशा
जन सुनवाई का मूल उद्देश्य था—पीड़ितों को त्वरित और वास्तविक न्याय मिलना। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। आवेदनों को कंप्यूटर सिस्टम में 'निराकृत' मार्क कर देना बेहद आसान है, लेकिन धरातल पर फरियादी आज भी अपनी कटी हुई पेंशन, अटके हुए पट्टे या रुकी हुई सरकारी मदद के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहा है।
अक्सर देखा जाता है कि नीचे के अधिकारी सिर्फ कागजी खानापूर्ति करने के लिए फाइल बंद कर देते हैं और पीड़ित को पता तक नहीं चलता कि उसका आवेदन किस आधार पर खारिज या बंद कर दिया गया। जब तक समस्या के समाधान से आवेदक संतुष्ट न हो, तब तक उसे 'निराकृत' कैसे माना जा सकता है?
आखिर जवाबदेही किसकी?
इस पूरी व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी सबसे बड़ी खामी है। इसके लिए सीधे तौर पर निम्नलिखित स्तरों पर जवाबदेही तय होनी चाहिए:
- विभाग प्रमुख और नोडल अधिकारी: जन सुनवाई में आए आवेदनों को संबंधित विभागों को फॉरवर्ड कर दिया जाता है। लेकिन उन विभागों के प्रमुखों ने केवल 'फाइल निपटाने' को प्राथमिकता दी, 'समस्या निपटाने' को नहीं।
- निगरानी तंत्र की विफलता: कलेक्टरेट स्तर पर जो मॉनिटरिंग सेल होती है, उसका काम सिर्फ यह देखना नहीं है कि फाइल बंद हुई या नहीं, बल्कि यह जांचना भी है कि आवेदक संतुष्ट है या नहीं। रैंडम फीडबैक (सत्यापन) की कोई पुख्ता व्यवस्था न होना इसकी बड़ी वजह है।
- प्रशासनिक नेतृत्व: जिला प्रशासन का यह दायित्व है कि वह जितना उत्साह आवेदनों की संख्या बताने में दिखाता है, उतनी ही ईमानदारी से हर महीने 'संतुष्टि इंडेक्स' जारी करे।
- संतुष्टि का प्रमाण पत्र: जब तक आवेदक खुद लिखित या डिजिटल माध्यम (जैसे OTP या फीडबैक कॉल) से यह न कह दे कि उसकी समस्या हल हो गई है, तब तक आवेदन को 'क्लोज' न किया जाए।
- मासिक रिपोर्ट कार्ड: प्रशासन हर महीने मीडिया और जनता के सामने यह आंकड़ा रखे कि—कुल प्राप्त आवेदन: X, वास्तविक समाधान: Y, असंतुष्ट आवेदक: Z।
- लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई: जिन विभागों में पेंडेंसी (लंबित मामले) ज्यादा है या जहाँ झूठी रिपोर्ट लगाकर फाइल बंद की गई है, वहाँ के अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
जनता का अधिकार: सूचना के अधिकार (RTI) और डिजिटल इंडिया के इस दौर में, हर जिले की वेबसाइट पर यह डेटा सार्वजनिक होना चाहिए कि किस विभाग ने कितने आवेदनों का संतुष्टिपूर्ण समाधान किया।
बदलाव की जरूरत: केवल 'इनपुट' नहीं, 'आउटपुट' का हो ऑडिट
अगर जन सुनवाई को महज एक प्रशासनिक औपचारिकता बनने से बचाना है, तो सरकार और उच्च अधिकारियों को कुछ सख्त कदम उठाने होंगे:
जन सुनवाई लोकतंत्र का एक खूबसूरत हिस्सा है, लेकिन इसे सिर्फ एक 'फोटो अपॉर्चुनिटी' या अखबारों की सुर्खियां बटोरने का जरिया नहीं बनने दिया जा सकता। जनता को आंकड़ों की बाजीगरी नहीं, अपनी समस्याओं का ठोस समाधान चाहिए। अब समय आ गया है कि प्रशासन इस 'मौन' को तोड़े और जवाबदेही स्वीकार करे।

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