एक बरसात में बहती है PWD की करोड़ो की रोड, तो पंचायत की ‘लाख’ वाली सड़कों से ‘अमरता’ की उम्मीद क्यों?
विशेष रिपोर्ट
मुख्य सुर्खियां
- बजट का विरोधाभास: करोड़ों का डामर पहली बारिश में लापता, कुछ लाख के सीसी रोड पर सालों टिकने का दबाव।
- सड़क एक, मापदंड दो: पीडब्ल्यूडी (PWD) की तकनीकी टीम फेल, पर ग्राम पंचायत के पंच-सरपंचों पर टिकी है जांच की सुई।
- जनता का सवाल: क्या शासन का दोहरा रवैया ही ग्रामीण विकास की रीढ़ तोड़ रहा है?
मुख्य समाचार
हर साल मानसून आते ही देश और प्रदेश के बुनियादी ढांचे की पोल खुलने लगती है। लेकिन इस मानसूनी बर्बादी के बीच एक ऐसा कड़वा सच छिपा है, जो शासन की नीतियों और उसके दोहरे रवैये पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। सवाल सीधा है— लोक निर्माण विभाग (PWD) जब करोड़ों की लागत से चमचमाती हाइवे और मुख्य सड़कें बनाता है, तो वे एक ही बरसात में ताश के पत्तों की तरह क्यों बह जाती हैं? वहीं दूसरी ओर, ग्राम पंचायतों को मिलने वाले महज दो-चार लाख रुपये के बजट से बनी गलियों और सड़कों से प्रशासन यह उम्मीद क्यों करता है कि वे सदियों तक 'अमर' रहेंगी?
करोड़ों का खेल, शून्य जवाबदेही
पीडब्ल्यूडी के पास भारी-भरकम बजट होता है। आधुनिक मशीनें, बड़ी निर्माण एजेंसियां, क्वालिफाइड इंजीनियर्स और क्वालिटी कंट्रोल की एक पूरी फौज होती है। इसके बावजूद, जैसे ही पहली मूसलाधार बारिश होती है, इन सड़कों की गिट्टियां और डामर पानी के साथ बह जाते हैं। बड़े ठेकेदार और अधिकारी 'प्राकृतिक आपदा' का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लेते हैं। करोड़ों रुपये पानी में बह जाते हैं, लेकिन मजाल है कि किसी बड़े ठेकेदार का लाइसेंस रद्द हो या किसी बड़े अधिकारी पर कड़ी गाज गिरे।
लाखों का बजट, जांच की तलवार
अब जरा सिक्के का दूसरा पहलू देखिए। ग्रामीण इलाकों में आंतरिक सड़कों (जैसे सीसी रोड या खड़ंजा) के लिए ग्राम पंचायतों को महज दो, तीन या चार लाख रुपये का बजट दिया जाता है। इस सीमित बजट में सरपंच या सचिव को सड़क भी बनानी होती है, मजदूरी भी देनी होती है और सामग्री भी खरीदनी होती है।
हैरानी की बात यह है कि इन 'लाख' वाली सड़कों पर प्रशासन की नजरें इतनी तिरछी होती हैं कि अगर एक साल बाद सड़क पर एक छोटा सा गड्ढा भी दिख जाए, तो पूरी पंचायत को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। रिकवरी के नोटिस थमा दिए जाते हैं, जांच बैठ जाती है और सरपंच-सचिव को 'भ्रष्टाचारी' घोषित करने में देर नहीं लगाई जाती।
बड़ा सवाल: जो तकनीकी मापदंड और ईमानदारी की उम्मीद दो लाख की सड़क बनाने वाले एक ग्रामीण सरपंच से की जाती है, वही उम्मीद करोड़ों का ठेका लेने वाली मल्टीनेशनल कंपनियों और पीडब्ल्यूडी के आला अफसरों से क्यों नहीं की जाती?
शासन के इस दोहरे रवैये के 3 बड़े नुकसान
- ग्रामीण विकास का दम घुट रहा है: पंचायतों पर अत्यधिक प्रशासनिक दबाव और बजट की कमी के कारण ग्रामीण स्तर पर जनप्रतिनिधि नया काम हाथ में लेने से डरने लगे हैं।
- जनता के पैसे की खुली लूट: पीडब्ल्यूडी की सड़कों के नाम पर हर साल करोड़ों का बजट पास होता है, जो कुछ ही महीनों में गड्ढों में तब्दील हो जाता है। यह टैक्सपेयर्स के पैसे की खुली बर्बादी है।
- जवाबदेही का अभाव: बड़ी मछलियां (बड़े ठेकेदार और अफसर) साफ बच निकलती हैं, जबकि छोटी मछलियों (सरपंच/रोजगार सहायक) पर ही सारा दोष मढ़ दिया जाता है।
अब बदलने होंगे नियम
अगर शासन सचमुच बुनियादी ढांचे को मजबूत करना चाहता है, तो उसे अपनी दूरबीन का फोकस बदलना होगा। जितनी बारीकी से पंचायतों के दो लाख रुपये का हिसाब मांगा जाता है, उतनी ही सख्ती से पीडब्ल्यूडी के दो सौ करोड़ का हिसाब भी सड़क पर दिखना चाहिए। सड़कों की गारंटी अवधि सिर्फ कागजों पर नहीं, जमीन पर लागू होनी चाहिए। जब तक 'बड़ी निर्माण एजेंसियों' को ब्लैकलिस्ट और दोषी अफसरों को जेल नहीं भेजा जाएगा, तब तक करोड़ों की सड़कें यूं ही हर बरसात में बहती रहेंगी और पंचायतें अपनी 'अमरता' की परीक्षा देती रहेंगी।

Comments
Post a Comment