नौनिहालों के निवाले पर सियासत और मुनाफाखोरी का खेल!
सरकारी राशन पर डाका: गांवों में मध्याह्न भोजन का अनाज खुलेआम बाजार में बिक रहा, रसूखदारों के संरक्षण में फल-फूल रहा 'गल्ला घोटाला'
- स्व-सहायता समूहों (SHGs) की आड़ में राजनीतिक रसूखदारों की चांदी; बच्चों की थाली से गायब हो रहा पोषण, उठ रही है 'स्पेशल ऑडिट' की मांग।
कटनी
ग्रामीण इलाकों में स्कूली बच्चों को कुपोषण से बचाने और उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शुरू की गई मध्याह्न भोजन (MDM) योजना अब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारियों के मुताबिक, कई ग्राम पंचायतों में मध्याह्न भोजन का संचालन करने वाले स्व-सहायता समूह (Self Help Groups) बच्चों को पौष्टिक भोजन देने के बजाय सरकारी गल्ले (अनाज) को खुले बाजार में बेचकर मोटी कमाई कर रहे हैं।
हैरानी की बात यह है कि इस पूरे खेल को कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधियों, राजनीतिक रसूखदारों और रसूखदार पदों पर आसीन लोगों का मूक संरक्षण प्राप्त है।
रसूखदारों के घरों में बंट रहा बच्चों का हक
जांच और जमीनी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, यह सिर्फ एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि एक सुनियोजित सिंडिकेट है। जिन समूहों के पास मध्याह्न भोजन की जिम्मेदारी है, उनमें से कई पर अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय नेताओं या उनके करीबियों का नियंत्रण है।
आरोप है कि स्कूलों के लिए आवंटित होने वाले गेहूं और चावल का एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर इन रसूखदारों के रिश्तेदारों, भाइयों और चहेतों के घरों तक पहुंचाया जा रहा है। सरकारी गल्ले को मुफ्त या औने-पौने दामों पर अपने करीबियों में बांटकर ये नेता ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं और जमकर 'वाहवाही' लूट रहे हैं।
कागजों पर 'पोषण', हकीकत में 'शोषण'
नियमानुसार, स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति के आधार पर हर महीने राशन का कोटा जारी होता है। लेकिन सूत्रों का दावा है कि धरातल पर बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता बेहद खराब है, या कई बार उन्हें पर्याप्त भोजन ही नहीं मिलता। दूसरी तरफ, बचा हुआ और छिपाया गया गल्ला सीधे कालाबाजारी के जरिए व्यापारियों को बेच दिया जाता है। इस काले धंधे से हर महीने लाखों रुपये की अवैध कमाई की जा रही है, जो सीधे तौर पर मासूम 'नौनिहालों के निवाले' पर डाका है।
क्यों जरूरी है 'स्पेशल और विधिवत ऑडिट'?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा लूपहोल (कमजोरी) मॉनिटरिंग और ऑडिट व्यवस्था का न होना है। ग्रामीणों और प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि इस भ्रष्टाचार को रोकने के लिए शासन को तत्काल प्रभाव से कड़े कदम उठाने चाहिए:
- फिजिकल वेरिफिकेशन: गोदाम से कितना अनाज निकला, स्कूल के रजिस्टर में कितनी एंट्री हुई और वास्तव में कितने बच्चों ने भोजन किया, इसका आमने-सामने मिलान (Physical Verification) होना चाहिए।
- वित्तीय और स्टॉक ऑडिट: हर स्व-सहायता समूह का पिछले कुछ वर्षों का विधिवत और निष्पक्ष ऑडिट कराया जाए, ताकि यह साफ हो सके कि आया हुआ गल्ला आखिर गया कहां?
- पारदर्शिता और जवाबदेही: रसूखदारों के दबाव से मुक्त होकर एक स्वतंत्र जांच टीम बनाई जाए, जो औचक निरीक्षण कर सच सामने लाए।
जनता की मांग: राजनीति के इस खेल पर लगे लगाम
गांव के सजग नागरिकों का कहना है कि जो लोग पदों पर बैठकर बच्चों के हक के अनाज से राजनीति चमका रहे हैं, उन्हें बेनकाब किया जाना जरूरी है। शासन-प्रशासन की चुप्पी इन भ्रष्टाचारियों के हौसलों को और बुलंद कर रही है। अब समय आ गया है कि सरकार इस मामले को संज्ञान में ले और दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करे, ताकि किसी गरीब के बच्चे को भूखा न सोना पड़े।

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