नशे से दूरी, फिर भी गंतव्य वही: क्या सिर्फ स्कूली आयोजनों से थमेगा 'ज़हर' का कारोबार?
विशेष रिपोर्ट | कटनी
‘नशे से दूरी, है बहुत जरूरी’—यह नारा इन दिनों जिले के तमाम सरकारी और निजी स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक चौराहों पर लगे होर्डिंग्स पर जगमगा रहा है। शासन-प्रशासन की ओर से युवाओं और विद्यार्थियों को नशा मुक्ति की शपथ दिलाई जा रही है, रैलियां निकाली जा रही हैं और निबंध-चित्रकला प्रतियोगिताओं के जरिए इस संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का दावा किया जा रहा है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इन अभियानों का ज़मीनी यथार्थ उतना ही गुलाबी है जितना रिपोर्टों में नज़र आता है?
कागज़ों में जनजागरूकता, सड़कों पर 'सुविधा'
कटनी जिले के आंकड़े अभियान की हकीकत बयां करने के लिए काफी हैं। जिले में लगभग 63 आधिकारिक लाइसेंसी शराब दुकानें संचालित हैं। सरकारी आंकड़ों से इतर, ज़मीनी हकीकत यह भी है कि गाँव-गाँव और मोहल्ले-मोहल्ले लगभग 400 से 500 अवैध पैकारियाँ धड़ल्ले से चल रही हैं।
जहाँ एक तरफ स्कूलों के बंद कमरों और परिसरों में बच्चों को नशे के नुकसान गिनाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्कूल से निकलते ही कुछ ही दूरी पर सुलभता से शराब और अन्य नशीले पदार्थ उपलब्ध हैं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या नशा मुक्ति अभियान महज एक 'इवेंट' और वार्षिक औपचारिकता बनकर रह गया है?
एक बड़ा सवाल:
जब नशा करने की उम्र में कदम रख रहे बच्चों को केवल बंद कमरों में नसीहत दी जा रही है, तब शराब की वैध और अवैध दुकानों के बाहर खरीदारों की भीड़ हर शाम बढ़ती जा रही है। अगर यह अभियान वाकई में बदलाव लाना चाहता है, तो इसकी दिशा और स्थान दोनों में बड़े बदलाव की आवश्यकता है।
क्या बदला जाए रणनीति का रुख?
अगर शासन और आबकारी विभाग वाकई नशे के खिलाफ कोई ठोस संदेश देना चाहते हैं, तो इन आयोजनों का दायरा स्कूलों के कमरों से बाहर निकालना होगा:
- दुकानों और पैकारियों के सामने लगे शिविर: जनजागरूकता के असली शिविर उन लाइसेंसी दुकानों और चिन्हित अवैध पैकारियों के ठीक सामने आयोजित होने चाहिए, जहाँ उपभोक्ता नशा खरीदने पहुँचते हैं।
- सीधा संवाद: जब कोई व्यक्ति दुकान की ओर कदम बढ़ाए, तब उसे 'नशा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है' का अहसास और उससे टूटने वाले परिवारों की व्यथा का आईना दिखाया जाना चाहिए।
- इवेंट नहीं, इच्छाशक्ति: केवल पोस्टर चिपकाने और रैलियों से आगे बढ़कर अवैध पैकारियों पर कठोर आबकारी व पुलिस कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।
जन-मन का मत
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि नशा मुक्ति अभियान की मंशा सही हो सकती है, लेकिन जब तक आपूर्ति की रीढ़ पर प्रहार नहीं होगा और जागरूकता अभियानों को सीधे 'डिमांड और सप्लाई' वाले स्थलों पर केंद्रित नहीं किया जाएगा, तब तक परिणाम नाममात्र ही रहेंगे।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस यथार्थ को स्वीकार कर अभियानों की दिशा बदलता है या फिर 'नशे से दूरी' का नारा महज़ सरकारी फाइलों और स्कूली स्पर्धाओं तक ही सीमित रह जाएगा।

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