कैलवारा खुर्द: ६ महीने से 'नौनिहालों' के निवाले पर डाका, भ्रष्टाचार के खेल में बीआरसी की भूमिका भी संदेह के घेरे में!
मुख्य बाते
- ग्राम पंचायत कैलवारा खुर्द के वार्ड नंबर १० का गंभीर मामला।
- स्कूल प्रबंधन ६ महीने से जेब से बना रहा मध्याह्न भोजन (MDM), बजट जा रहा पूर्व सरपंच के खाते में।
- हेडमास्टर शहनाज बेगम की शिकायतों पर बीआरसी मनोज गौतम ने साधी चुप्पी; मिलीभगत की आशंका।
- नौनिहालों की सेहत और शिक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ को लेकर उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज।
कैलवारा खुर्द। देश और प्रदेश की सरकारें जहां एक ओर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों (नौनिहालों) के स्वास्थ्य और पोषण को लेकर करोड़ों रुपये का बजट पानी की तरह बहा रही हैं, वहीं जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार की दीमक इस पूरे तंत्र को खोखला कर रही है। ऐसा ही एक बेहद चौंकाने वाला और शर्मनाक मामला ग्राम पंचायत केलवारा खुर्द के छह घरा (वार्ड नंबर १०) से सामने आया है, जहां पिछले छह महीनों से मासूम बच्चों के हक के निवाले पर सरेआम डाका डाला जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
वार्ड नंबर १० स्थित शासकीय स्कूल में पिछले लगभग ६ महीनों से स्कूल प्रबंधन और शिक्षक जैसे-तैसे व्यवस्था कर बच्चों के लिए खाना (मध्याह्न भोजन) बनवा रहे थे। लेकिन इस पूरी व्यवस्था का सबसे हैरान और आक्रोशित करने वाला पहलू यह है कि खाना बनाने और राशन की जो भी राशि सरकारी तंत्र से जारी हो रही थी, उसका भुगतान स्कूल को मिलने के बजाय ग्राम पंचायत केलवारा खुर्द की पूर्व सरपंच और माधुरी पाठक के निजी खाते में धड़ल्ले से जा रहा था।
सवालों के घेरे में यह बात है कि जो व्यक्ति पद पर ही नहीं है, और जिसका स्कूल के भोजन प्रबंधन से वर्तमान में कोई सीधा वास्ता नहीं है, उसके खाते में महीनों तक सरकारी राशि कैसे ट्रांसफर होती रही? और सबसे बड़ा सवाल यह कि ६ महीने बीत जाने के बाद भी यह राशि पूर्व सरपंच द्वारा स्कूल प्रबंधन या हेडमास्टर को क्यों नहीं सौंपी गई?
हेडमास्टर ने कई बार की शिकायत, पर सोता रहा विभाग
इस वित्तीय गबन और तानाशाही के खिलाफ स्कूल की हेडमास्टर शहनाज बेगम ने हिम्मत दिखाते हुए आवाज उठाई। हेडमास्टर ने बच्चों के हक की राशि के लिए एक-दो बार नहीं, बल्कि पिछले ६ महीनों में कई बार विकासखंड स्रोत समन्वयक (बीआरसी) कार्यालय में लिखित और मौखिक शिकायतें दर्ज कराईं। उन्होंने साफ किया कि राशि न मिलने के कारण बच्चों को सही पोषण देने और व्यवस्था चलाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
बीआरसी मनोज गौतम की भूमिका संदेह के घेरे में!
जब इस पूरे घालमेल को लेकर बीआरसी मनोज गौतम से सीधे बात की गई, तो उन्होंने बेहद गैर-जिम्मेदाराना ढंग से केवल इतना कहकर पल्ला झाड़ लिया कि— "हां, शिकायत आई है और मामला संज्ञान में है।"
अब यहां सबसे गंभीर और यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि यदि शिकायत पिछले ६ महीनों से लगातार आ रही थी, तो बीआरसी मनोज गौतम ने अब तक इस पर कोई दंडात्मक या सुधारात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की? नौनिहालों की सेहत से जुड़े इस संवेदनशील मामले पर ६ महीने तक कुंडली मारकर बैठे रहना, बीआरसी की कार्यप्रणाली पर गहरा संदेह पैदा करता है। स्थानीय ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों का स्पष्ट आरोप है कि इस पूरे भ्रष्टाचार के खेल में बीआरसी मनोज गौतम की संलिप्तता भी कहीं न कहीं है, जिसके बिना इतना बड़ा वित्तीय गबन संभव नहीं है।
उच्च स्तरीय जांच की उठ रही मांग
यह सीधे तौर पर मासूम बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ और सरकारी धन के दुरुपयोग (भ्रष्टाचार) का आपराधिक मामला है। इस मामले में पूर्व सरपंच माधुरी पाठक की मनमानी और बीआरसी कार्यालय की संदेहास्पद चुप्पी ने शिक्षा विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
अब क्षेत्र के ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन, कलेक्टर एवं शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों से इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग की है। मांग की जा रही है कि:
- पूर्व सरपंच के खाते में गई राशि को तुरंत रिकवर कर स्कूल प्रबंधन को सौंपा जाए।
- दोषी पूर्व सरपंच और लापरवाही बरतने या सांठगांठ करने वाले बीआरसी मनोज गौतम के खिलाफ सख्त कानूनी व विभागीय कार्रवाई की जाए।
अगर समय रहते इन भ्रष्टाचारियों पर नकेल नहीं कसी गई, तो सरकारी व्यवस्था से गरीबों और मासूम बच्चों का भरोसा उठना तय है।
(ब्यूरो रिपोर्ट)


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