कैलवारा खुर्द में 'मासूमों के निवाले' पर दबंगई का पहरा: रसूख के आगे नियम-कायदे बौने, जांच के घेरे में घिरीं पूर्व सरपंच चला रहीं स्वसहायता समूहों की 'समानांतर सरकार'
कटनी/कैलवारा खुर्द।
सरकारी योजनाओं को किस तरह एक रसूखदार के एकाधिकार और प्रशासनिक शिथिलता की दीमक चट कर रही है, इसका जीता-जागती बानगी ग्राम कैलवारा खुर्द में देखने को मिल रही है। यहाँ सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ियों में देश के भविष्य यानी नौनिहालों को मिलने वाले मध्यान्ह भोजन (MDM) की गुणवत्ता के साथ सरेआम खिलवाड़ किया जा रहा है। सूत्रों और जमीनी हकीकत से मिली जानकारी के मुताबिक, इस पूरे खेल के पीछे किसी और का नहीं, बल्कि गांव की पूर्व सरपंच माधुरी भूषण पाठक का हाथ है, जिनके सानिध्य में नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए बच्चों के निवाले का शोषण किया जा रहा है।
नियम ताक पर: किचन शेड के बजाय 'अज्ञात' ठिकानों से तय हो रहा बच्चों का राशन
शासन के सख्त निर्देश हैं कि मध्यान्ह भोजन संचालित करने वाले स्वसहायता समूह जिस कोटे का गल्ला (राशन) सरकारी दुकान से उठाते हैं, उसे अनिवार्य रूप से उसी स्कूल या आंगनवाड़ी के 'किचन शेड स्टोर रूम' में रखा जाना चाहिए जहाँ भोजन बनता है। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि राशन की चोरी रोकी जा सके और पारदर्शिता बनी रहे।
लेकिन कैलवारा खुर्द, झोरी टोला आंगनवाड़ी, मध्यान माध्यमिक शाला कैलवारा खुर्द और टिकरिया जैसे क्षेत्रों में कहानी बिल्कुल उलट है। यहाँ समूहों का पूरा नियंत्रण और राशन का भंडारण कथित तौर पर नियमों के विपरीत किया जा रहा है। सारे स्वसहायता समूहों पर एक ही परिवार और पूर्व सरपंच का 'एकाधिकार' है। नतीजा यह है कि बच्चों की थाली से पौष्टिकता गायब है और मीनू (Menu) सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है।
बड़ा सवाल: जब समूह स्वतंत्र हैं, तो उनका नियंत्रण एक ऐसे जनप्रतिनिधि के हाथों में क्यों है जो खुद भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी हुई हैं?
घोटालों की लंबी फेहरिस्त: आदिवासी भवन से लेकर अतिरिक्त राशि आहरण तक की जांच
हैरानी की बात यह है कि जिस पूर्व सरपंच के इर्द-गिर्द मध्यान्ह भोजन का यह पूरा साम्राज्य घूम रहा है, उनका अपना ट्रैक रिकॉर्ड पहले से ही भारी दागदार है। प्रशासनिक सूत्रों की मानें तो वर्तमान में माधुरी भूषण पाठक पर कई गंभीर जांचें लंबित हैं:
- आदिवासी सामुदायिक भवन घोटाला: आदिवासियों के कल्याण के लिए बनने वाले सामुदायिक भवन में वित्तीय अनियमितता के आरोप में जांच चल रही है, जिसमें पूर्व सरपंच पर लगभग ढाई लाख रुपये{₹}2,50,000) की रिकवरी भी निकाली जा चुकी है।
- अतिरिक्त राशि आहरण: इसके अलावा, तीन अलग-अलग निर्माण कार्यों में तय मूल्यांकन से अधिक अतिरिक्त राशि निकालने (ओवर-ड्रॉइंग) का मामला भी जांच के दायरे में है।
हाईकोर्ट के आदेश को भी ठेंगा: शासकीय जमीन पर पुनः अवैध कब्जा और दबंगई
पूर्व सरपंच के हौसले कितने बुलंद हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके कार्यकाल के दौरान शासकीय आराजी नंबर 326/2 पर अवैध रूप से कब्जा करके पांच दुकानों का निर्माण करा दिया गया था।
मामला जब माननीय उच्च न्यायालय तक पहुंचा, तो कोर्ट के कड़े आदेश के बाद प्रशासन ने इन दुकानों को जमींदोज कर दिया था। लेकिन कानून के डर को धता बताते हुए, सूत्रों के अनुसार उसी शासकीय जमीन पर दबंगई के बल पर पुनः निर्माण कार्य करा लिया गया है, जो सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना और शासकीय संपत्ति पर डकैती जैसा है।
जिम्मेदार मौन, जनता में आक्रोश
इतने गंभीर आरोपों, वित्तीय रिकवरी और कोर्ट के आदेश के बाद भी पूर्व सरपंच का स्वसहायता समूहों और बच्चों के भोजन पर नियंत्रण बने रहना, स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है। ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि आखिर कब तक मासूम बच्चों के हक के राशन की आड़ में रसूखदारों की जेबें भरती रहेंगी?
इस पूरे मामले में अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और जिला पंचायत सीईओ इस समानांतर चल रहे सिंडिकेट को तोड़ने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं, या फिर रसूख के आगे नियम ऐसे ही घुटने टेकते रहेंगे।
(नोट: यह एक समाचार प्रारूप/स्क्रिप्ट है। इसे प्रकाशित करने से पहले आवश्यक कानूनी सलाह और प्रशासनिक अधिकारियों (जैसे जनपद सीईओ या खाद्य विभाग) का पक्ष (Statement) लेना उचित रहेगा।)
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