दोगली नीतियां: एक तरफ राजस्व का लालच, दूसरी तरफ नशामुक्ति का ढोंग!
विशेष रिपोर्ट
कटनी। 'नशे से दूरी, है बहुत जरूरी'— यह वह चमकीला नारा है जिसे सरकारी विज्ञापनों, दीवारों और जागरूकता रैलियों में चमकाने के लिए हर साल लाखों-करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते हैं। लेकिन जब जमीनी हकीकत का रुख करें, तो यह नारा महज एक कागजी औपचारिकता नजर आता है। कटनी जिले में पैर पसार चुका अवैध शराब का काला कारोबार और सरकार की दोहरी नीतियां इस बात का जीता-जागता सबूत हैं।
63 लाइसेंसी दुकानें, और उनके साए में 600 से ज्यादा अवैध 'पैकारियां'
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कटनी जिले में करीब 63 लाइसेंसी शराब दुकानें स्वीकृत हैं। नियम कहते हैं कि शराब सिर्फ इन्हीं चुनिंदा काउंटरों से बेची जा सकती है। लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है। सूत्रों और जमीनी हकीकत की मानें तो हर एक लाइसेंसी दुकान की शह पर उसके आस-पास लगभग 10 अवैध 'पैकारियां' (अवैध बिक्री केंद्र) धड़ल्ले से संचालित हो रही हैं।
गणित साफ है— अगर 63 दुकानें हैं, तो जिले के गांवों, कस्बों और गलियों में ऐसा अनुमान है कि लगभग 600 से अधिक अवैध पैकारियां बिना किसी खौफ के चौबीसों घंटे मधुशाला बनी हुई हैं। यह पूरा खेल आबकारी विभाग और जिम्मेदार तंत्र की नाक के नीचे चल रहा है।
जब घर-घर पहुंच रही शराब, तो जागरूकता पर लाखों क्यों?
सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यही है कि जब शासन-प्रशासन की मूक सहमति से इतनी बड़ी मात्रा में वैध और अवैध दुकानें अलॉट और संचालित हो रही हैं, तो फिर 'नशामुक्ति अभियान' के नाम पर जनता के टैक्स का लाखों रुपया क्यों फूंका जा रहा है?
एक तरफ नई पीढ़ी को नशे से दूर रहने का उपदेश दिया जाता है, दूसरी तरफ किराना दुकानों, टपरियों और ढाबों तक अवैध पैकारियों के जरिए शराब की उपलब्धता को बेहद आसान बना दिया गया है। क्या यह विरोधाभास सरकारी खजाने को भरने और सिर्फ कागजी खानापूर्ति करने का जरिया मात्र नहीं है?
"अगर वाकई नशे से दूरी एक संदेश है, तो पहला कदम जागरूकता के पोस्टर छापना नहीं, बल्कि नशे की इन दुकानों पर ताला लगाना होना चाहिए। जब तक जड़ में पानी दिया जाएगा, तब तक पत्तों को सुखाने का नाटक बंद होना चाहिए।"
— जागरूक नागरिक, कटनी
नशामुक्ति का एकमात्र विकल्प: पूर्ण तालाबंदी
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का स्पष्ट मानना है कि अगर सरकार वाकई समाज को नशामुक्त करना चाहती है, तो इसका 'शराबबंदी' के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
पर्चियां बांटने और रैलियां निकालने से नशा कम नहीं होगा, बल्कि इसके लिए कड़े फैसले लेने होंगे। जब तक शराब की दुकानें खुली रहेंगी और उनके संरक्षण में अवैध पैकारियों का जाल बुना जाता रहेगा, तब तक 'नशे से दूरी' का नारा सिर्फ एक मजाक बनकर रह जाएगा। अब वक्त आ गया है कि सरकार राजस्व के लालच से ऊपर उठकर जनता के स्वास्थ्य और भविष्य के बारे में सोचे।
— ब्यूरो रिपोर्ट

Comments
Post a Comment