विशेष रिपोर्ट: ज़ुबान पर 'नशा मुक्ति', ज़मीन पर 'मधुशाला'—शासन के दोहरे मापदंड पर उठते सुलगते सवाल
विशेष
कटनी
शासन की नीतियां और उनके जमीनी क्रियान्वयन में कितना बड़ा फासला हो सकता है, इसका सबसे सटीक उदाहरण इन दिनों जिला स्तरों पर देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां प्रशासनिक अमला लाखों रुपए के बजट के साथ "नशे से दूरी, है बहुत जरूरी" जैसे बड़े-बड़े होर्डिंग्स, रैलियों और इवेंट्स में व्यस्त है, वहीं दूसरी तरफ उसी प्रशासन के हस्ताक्षर से शहर के कोने-कोने में शराब की नई दुकानों के लाइसेंस बांटे जा रहे हैं। जनता अब खुलकर पूछ रही है—यह दोहरा मापदंड क्यों?
सरकारी खजाना बनाम जनहित का टकराव
यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि शराब से मिलने वाला राजस्व सरकारों के लिए आय का एक बहुत बड़ा जरिया है। लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब सरकारें एक हाथ से राजस्व बटोरने के लिए वैध और अवैध शराब के जाल को फैलने देती हैं, और दूसरे हाथ से जनता को 'नशा मुक्ति' का उपदेश देती हैं।
"लाखों रुपए खर्च करके नशा मुक्ति का भाषण देना और फिर उसी सभा के 500 मीटर दायरे में नई शराब दुकान का फीता काट देना, यह प्रशासन की दोहरी मानसिकता को दर्शाता है। अगर नशा वाकई बर्बादी की जड़ है, तो इसे गली-गली बेचने की अनुमति क्यों?"
स्थानीय जागरूक नागरिक
अवैध 'पेकारियां' प्रशासन की नाक के नीचे समानांतर व्यवस्था
विवाद सिर्फ लाइसेंसशुदा दुकानों तक सीमित नहीं है। जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा खौफनाक है। हर एक वैध शराब ठेके के पीछे 5 से 10 अवैध पेकारियां (अवैध बिक्री केंद्र) धड़ल्ले से संचालित हो रही हैं।
- गांव-गांव तक पहुंच: मुख्य दुकान भले ही हाईवे या शहर में हो, लेकिन इसकी अवैध पेकारियां किराना दुकानों, ढाबों और पान टपरियों तक पैर पसार चुकी हैं।
- प्रशासनिक मौन: क्या यह मुमकिन है कि पुलिस और आबकारी विभाग को इन अवैध ठिकानों की खबर न हो? जनता का सीधा आरोप है कि यह सब मिलीभगत और 'महीने की बंधी रकम' के दम पर चल रहा है।
बड़ा सवाल: आखिर कब तक चलेगा यह ढोंग? यदि शासन सचमुच समाज को नशा मुक्त देखना चाहता है, तो उसे अपनी नीतियों में ईमानदारी लानी होगी। राजस्व की भूख में युवाओं के भविष्य को झोंकना और फिर 'नशा मुक्ति सप्ताह' मनाकर पल्ला झाड़ लेना, महज़ एक सरकारी औपचारिकता बनकर रह गया है।
अब समय आ गया है कि शासन इस 'दोहरे मापदंड' को बंद करे। या तो वो खुलकर कहे कि उसे सिर्फ राजस्व से सरोकार है, या फिर इच्छाशक्ति दिखाते हुए इन वैध दुकानों की संख्या कम करे और अवैध पेकारियों पर बुलडोजर चलाए। जनता तमाशा देख रही है, और अब वो सवाल भी पूछ रही है। |
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