अनुशासित 'कैडर' में बगावत की आग, क्या दतिया ने हिला दी भाजपा की 'कंट्रोल' वाली साख?
विशेष प्रतिनिधि, भोपाल/दतिया
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हमेशा से एक बेहद अनुशासित, कैडर-आधारित और 'हाईकमान के फैसले को सिरोधार्य' करने वाली पार्टी माना जाता रहा है। लेकिन दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए जैसे ही भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का पत्ता काटकर युवा चेहरा आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा, वैसे ही अनुशासन की यह दीवार भरभरा कर ढह गई।
दतिया की सड़कों पर जो हुआ, उसने न सिर्फ पार्टी आलाकमान को चौंकाया, बल्कि विपक्ष को भी यह पूछने का मौका दे दिया कि "क्या भाजपा अब अपने ही कार्यकर्ताओं पर नियंत्रण खो चुकी है?"
12 घंटे का 'चक्काजाम' और रणक्षेत्र बनी दतिया की सड़कें
जैसे ही दिल्ली से आशुतोष तिवारी के नाम की घोषणा हुई, नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। जिस दतिया में नरोत्तम मिश्रा निर्विवाद नेता माने जाते थे, वहां की सड़कों पर अभूतपूर्व नजारा देखने को मिला:
- NH-44 पर 15 किमी लंबा जाम: आक्रोशित कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने झांसी-ग्वालियर हाईवे (NH-44) को करीब 12 घंटे तक पूरी तरह ब्लॉक रखा।
- पथराव और आंसू गैस के गोले: विरोध प्रदर्शन उस समय हिंसक हो उठा जब पुलिस ने जाम हटाने की कोशिश की। प्रदर्शनकारियों की तरफ से हुए पथराव में दतिया एसपी समेत छह पुलिसकर्मी घायल हो गए। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।
- सामूहिक इस्तीफों की झड़ी: केवल सड़क पर ही नहीं, बल्कि संगठन के भीतर भी बगावत हो गई। भाजपा जिलाध्यक्ष समेत पूरी जिला कार्यकारिणी और कई पार्षदों ने सामूहिक रूप से अपने पदों से इस्तीफा दे दिया।
कार्यकर्ताओं के इस 'आक्रोश' की तीन मुख्य वजहें
1. 'दादा' की जमीनी पकड़ को नजरअंदाज करना: नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों का तर्क है कि 2023 के मुख्य चुनाव में भले ही वह करीब 7,500 वोटों से हार गए हों, लेकिन दतिया में संगठन और जनता पर उनकी पकड़ अभी भी सबसे मजबूत है। उनके समर्थकों ने नामांकन फॉर्म तक खरीद लिया था, जिससे उन्हें पूरा भरोसा था कि टिकट 'दादा' को ही मिलेगा।
2. 'बाहरी' बनाम 'स्थानीय' का मुद्दा: समर्थकों का दावा है कि पार्टी ने जिसे टिकट दिया है, उसे क्षेत्र के आम कार्यकर्ता ठीक से जानते तक नहीं हैं। ऐसे में कद्दावर नेता की जगह नए चेहरे को लाना पार्टी के लिए आत्मघाती हो सकता है।
3. राजेंद्र भारती की विधायकी जाने का 'अधूरा' बदला: कांग्रेस के राजेंद्र भारती को कोर्ट से 3 साल की सजा मिलने के बाद यह सीट खाली हुई है। मिश्रा के समर्थक चाहते थे कि नरोत्तम मिश्रा खुद चुनाव लड़कर इस सियासी हार का बदला लें।
क्या भाजपा का 'कंट्रोल' कमजोर हुआ है? (राजनीतिक विश्लेषण)
इस घटना ने भाजपा के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान को उजागर कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति केवल दतिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कैडर-आधारित पार्टी के बदलते मिजाज को दर्शाती है:

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