विशेष रिपोर्ट
ग्राम पंचायतों के विकास में रोड़ा बनी मूल्यांकन की लेटलतीफी, समय पर काम का हिसाब न होने से पंचायत प्रतिनिधि हतोत्साहित
नियमों की अनदेखी: 7 से 15 दिन में होना चाहिए कार्यों का मूल्यांकन, लेकिन महीनों लग रहे हैं; डेप्रिसिएशन के कारण घट रही कार्यों की वैल्यू।
कटनी
ग्रामीण विकास की रीढ़ मानी जाने वाली ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों की सुस्त रफ्तार के पीछे केवल फंड की कमी ही नहीं, बल्कि 'सही समय पर कार्यों का मूल्यांकन न होना' भी एक बहुत बड़ा कारण है। प्रशासनिक सुस्ती और तकनीकी अधिकारियों की लेटलतीफी के कारण पंचायत स्तर पर हुए अच्छे कार्यों पर भी पानी फिर रहा है, जिसका सीधा असर पंचायत प्रतिनिधियों के मनोबल और गांव के विकास पर पड़ रहा है।
क्या है नियम?
पंचायती राज व्यवस्था के सुचारू संचालन और पारदर्शिता के लिए स्पष्ट नियम बनाए गए हैं। नियमानुसार, ग्राम पंचायत द्वारा पूर्ण किए गए किसी भी निर्माण या विकास कार्य का जनपद पंचायत में तैनात जूनियर इंजीनियर (जे.ई.) या उपयंत्री द्वारा 7 से 15 दिन के भीतर मूल्यांकन कर दिया जाना चाहिए। ताकि कार्य का समय पर भुगतान हो सके और अगले विकास कार्यों की रूपरेखा तैयार की जा सके।
देरी से होते हैं ये बड़े नुकसान:
धरातल पर स्थिति नियमों से बिल्कुल उलट है। मूल्यांकन में महीनों का समय लग जाना अब एक आम बात हो गई है। इस देरी के कारण कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं:
- डेप्रिसिएशन (मूल्य ह्रास) की मार: कार्य पूर्ण होने के बाद यदि मूल्यांकन में लंबा समय गुजरता है, तो मौसम की मार, उपयोग या अन्य प्राकृतिक कारणों से नवनिर्मित कार्य में टूट-फूट या घिसावट (Depreciation) होने लगती है।
- गड़बड़ियों की आशंका: लंबे समय तक कार्य का भौतिक सत्यापन न होने से निर्माण में कई तरह की अनियमितताओं या छेड़छाड़ की आशंका बढ़ जाती है।
- कम मूल्यांकन होना: जब जेई महीनों बाद साइट पर पहुंचते हैं, तो डेप्रिसिएशन के कारण वास्तविक लागत की तुलना में कार्य का मूल्यांकन कम होता है। इससे पंचायत को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
हतोत्साहित हो रहे पंचायत प्रतिनिधि
जब पंचायतें मेहनत और अपनी साख लगाकर गांव में विकास कार्य करवाती हैं और मूल्यांकन कम होने या भुगतान लटकने जैसी स्थिति बनती है, तो सरपंच और पंचों का व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है। वे खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं और आगे के कार्यों के लिए पूरी तरह से हतोत्साहित (Demoralized) हो जाते हैं। आर्थिक जिम्मेदारी और जनता के सवालों के बीच जनप्रतिनिधि पिस रहे हैं।
निष्कर्ष:
एक स्वस्थ और सशक्त पंचायती राज की स्थापना के लिए यह नितांत आवश्यक है कि प्रशासनिक तंत्र जवाबदेह बने। यदि ग्राम पंचायतों को सही मायने में विकास की ओर ले जाना है, तो जनपद पंचायतों के तकनीकी अमले को पाबंद किया जाना चाहिए कि वे हर हाल में 7 से 15 दिन की तय समय-सीमा के भीतर मूल्यांकन का कार्य पूरा करें। समयबद्धता से न केवल कार्यों में गुणवत्ता और पारदर्शिता आएगी, बल्कि पंचायत प्रतिनिधियों का उत्साह भी बना रहेगा।

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