लाडली बहनों पर मेहरबानी, लेकिन 'बुढ़ापे की लाठी' क्यों बेगानी?
एक तरफ लगातार घोषणाएं, दूसरी तरफ तीन महीने से रुकी बुजुर्गों की ₹600 की पेंशन
विशेष संवाददाता, कटनी
चुनावी वादे और लोक-लुभावन योजनाएं सरकार की प्राथमिकता में सबसे ऊपर हो सकती हैं, लेकिन जब इसके चक्कर में समाज का सबसे कमजोर और निराश्रित वर्ग पिसने लगे, तो व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। राज्य में इन दिनों 'लाडली बहना योजना' को लेकर सरकार का उत्साह चरम पर है। बहनों के खातों में लगातार तोहफों की बारिश हो रही है, लेकिन इसी चमक-दमक के पीछे एक स्याह हकीकत छिपी है—राज्य के लाखों बुजुर्गों की 'बुढ़ापे की लाठी' यानी वृद्धावस्था पेंशन पिछले तीन महीनों से थमी हुई है।
1. ₹600 के लिए तरस रहे निराश्रित वृद्ध
एक तरफ नई लाडली बहनों को जोड़ने की प्रक्रिया रुकी हुई है, जिससे पुरानी हितग्राही ही लाभ पा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ बेहद संवेदनशील मानी जाने वाली वृद्धावस्था पेंशन पर जैसे 'अघोषित ब्रेक' लग गया है।
हकीकत यह है कि: प्रदेश के उन निराश्रित बुजुर्गों को पिछले तीन महीने से ₹600 की मासिक पेंशन नहीं मिली है, जिनके पास न तो कोई सहारा है और न ही आय का कोई दूसरा साधन। दवाइयों से लेकर दो वक्त की रोटी के लिए ये बुजुर्ग इस बेहद मामूली रकम पर निर्भर हैं।
2. 'लाडली' बनाम 'बुजुर्ग': क्या खाली हो रहा है खजाना?
अर्थशास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या एक ही योजना पर भारी-भरकम राशि खर्च करने से राज्य का खजाना खाली हो रहा है?
- असंतुलन की स्थिति: लाडली बहनों को खुश रखने के चक्कर में सरकार का पूरा ध्यान एक ही तरफ केंद्रित हो गया है।
- उपेक्षित वर्ग: वृद्धावस्था, दिव्यांग और कल्याणी (विधवा) पेंशन जैसी संवेदनशील योजनाओं के बजट में कटौती या देरी सीधे तौर पर मानवीय संकट को आमंत्रण दे रही है।
3. "वाह रे सरकार! कम से कम ₹1000 तो मिले"
बढ़ती महंगाई के इस दौर में ₹600 की कीमत ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। ज़मीनी स्तर पर बुजुर्गों और सामाजिक संगठनों की मांग है कि इस राशि को तुरंत बढ़ाकर कम से कम ₹1000 प्रति माह किया जाना चाहिए।
ग्राउंड ज़ीरो पर रहने वाले 72 वर्षीय वृद्ध रुआंसे होकर कहते हैं—
"सरकार बहनों को पैसे दे, हमें कोई आपत्ति नहीं है। आखिर वो भी हमारी बेटियां-बहनें हैं। लेकिन हमारी दवाइयों के पैसे रोककर क्यों? क्या सरकार को हमारा बुढ़ापा दिखाई नहीं देता?"
संपादकीय दृष्टिकोण: संतुलन खोती सामाजिक सुरक्षा
सरकारों को यह समझना होगा कि सामाजिक सुरक्षा कोई 'चुनावी रेवड़ी' नहीं बल्कि नागरिकों का अधिकार है। लाडली बहना योजना का प्रचार-प्रसार अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन बुज़ुर्गों, निराश्रितों और दिव्यांगों की थाली छीनकर अगर विकास की इबारत लिखी जा रही है, तो वह खोखली है। प्रशासन को तुरंत दखल देकर रुकी हुई पेंशन जारी करनी चाहिए और वृद्धों के सम्मान के लिए इस राशि में सम्मानजनक बढ़ोतरी करनी चाहिए।
अब देखना यह है कि क्या सरकार की नजर इस गंभीर मुद्दे पर पड़ती है या फिर विज्ञापन की चमक में बुजुर्गों के आंसू यूं ही ओझल होते रहेंगे?

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