नशे से दूरी है बहुत जरूरी 2.0: स्लोगन और यथार्थ के बीच झूलती जमीनी हकीकत
कटनी
"नशे से दूरी है बहुत जरूरी 2.0" — यह केवल एक सरकारी नारा नहीं, बल्कि समाज को गर्त में धकेल रहे नशे के खिलाफ छिड़ी एक मुहिम का दावा है। प्रदेश भर में अभियान के दूसरे चरण का ढोल-नगाड़ों के साथ आगाज तो हो चुका है, लेकिन कटनी जिले की कड़वी सच्चाई इस स्लोगन की मंशाहों पर सीधे सवाल खड़े कर रही है।
सवाल यह है कि क्या सरकारी कागजों में चमकता यह स्लोगन जमीनी धरातल पर हकीकत बन पाएगा? या फिर हमेशा की तरह अवैध शराब और नशीले पदार्थों का फैला जाल इसे एक बार फिर बेअसर कर देगा?
आंकड़ों का खेल और पैकारियों का मकड़जाल
कटनी जिले की भौगोलिक स्थिति और यहां का मौजूदा ढांचा खुद में कई विरोधाभास समेटे हुए है:
- 63 वैध लाइसेंसी दुकानें: जिले भर में आबकारी विभाग द्वारा संचालित 63 आधिकारिक शराब दुकानें मौजूद हैं।
- अवैध पैकारियों की भरमार: जमीनी सूत्रों और स्थानीय निवासियों की मानें तो हर वैध दुकान के साये में 8 से 10 अवैध पैकारियां धड़ल्ले से चल रही हैं।
- गांव-गांव तक पहुंच: मुख्य दुकानों से निकलकर शराब का नेटवर्क ढाबों, किराना दुकानों और ग्रामीण क्षेत्रों के मुख्य चौराहों तक बिना किसी खौफ के फैला हुआ है।
- पैकारियों पर नकेल: जिले की सभी 63 दुकानों के आसपास चलने वाली अवैध पैकारियों को चिन्हित कर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।
- जवाबदेही तय हो: जिस क्षेत्र में अवैध शराब बिकती मिले, वहां के बीट प्रभारी और आबकारी अधिकारी की सीधी जवाबदेही तय की जाए।
- सामुदायिक निगरानी: स्थानीय ग्रामीणों और महिला स्व-सहायता समूहों को पैकारियां बंद कराने का अधिकार और सुरक्षा मिले।
बड़ा सवाल: जब शराब की उपलब्धता हर 500 मीटर पर बिना किसी रोक-टोक के बनी हुई है, तो नशा मुक्ति के दावों में कितनी ईमानदारी है?
क्या सिर्फ नारों से बदलेगी सूरत?
स्थानीय प्रबुद्धजनों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि केवल बैनर-पोस्टर लगाने या शपथ दिलाने से नशा मुक्ति संभव नहीं है।
"जब तक 63 दुकानों की आड़ में फल-फूल रही सैकड़ों अवैध पैकारियों पर बुलडोजर जैसी सख्त कार्रवाई नहीं होती और इनकी सप्लाई चेन नहीं तोड़ी जाती, तब तक 'नशे से दूरी 2.0' का हश्र भी पहले चरण जैसा ही होगा।"
— स्थानीय नागरिक व समाजसेवी
अब आगे क्या?
यदि शासन और प्रशासन वाकई "नशे से दूरी" को जिले में चरितार्थ करना चाहते हैं, तो उन्हें विज्ञापनों से आगे बढ़कर जीरो टॉलरेंस पॉलिसी अपनानी होगी:
नशा मुक्ति का सपना नारों से नहीं, प्रशासनिक इच्छाशक्ति से पूरा होगा। अब देखना यह है कि कटनी प्रशासन इस स्लोगन को सफलता की मिसाल बनाता है या यह महज एक और सरकारी औपचारिकता बनकर रह जाता है।

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