विशेष रिपोर्ट: कागजों पर साफ, हकीकत में 'हरी-भरी' कटनी नदी
लाखों स्वाहा, फिर भी जलकुंभी का 'साम्राज्य'; क्या सिर्फ बजट ठिकाने लगाने का जरिया बन गई है जीवनदायिनी?
कटनी।
कहने को तो कटनी नदी इस शहर की जीवनदायिनी है, लेकिन आज इसकी बदहाली पर आंसू बहाने वाला कोई नहीं है। कटनी नगर निगम हर साल नदी की सफाई के नाम पर लाखों रुपयों का बजट 'पानी' की तरह बहा देता है। बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, पोकलेन मशीनें उतरती हैं, और फोटो सेशन भी होते हैं। लेकिन नतीजा? ढाक के तीन पात! आज भी कटनी नदी पानी से नहीं, बल्कि हरी-भरी जलकुंभी के भारी अंबार से पटी पड़ी है।
जनता का सवाल सीधा है—क्या सफाई सिर्फ सरकारी फाइलों और बयानों तक ही सीमित है? क्या इस जलकुंभी का कोई स्थाई इलाज नहीं है?
तस्वीर झूठ नहीं बोलती: नदी या घास का मैदान?
यदि आप आज कटनी नदी के पुल से नीचे झांकेंगे, तो आपको यह पहचानना मुश्किल हो जाएगा कि यह कोई बहती हुई नदी है या खेल का मैदान। जलकुंभी की मोटी परत ने नदी का दम घोंट रखा है।
- सूरज की किरणें तरसीं: जलकुंभी के कारण पानी के भीतर ऑक्सीजन का स्तर लगातार गिर रहा है, जिससे जलीय जीवन खत्म हो रहा है।
- सड़न और बदबू: जहां पानी थोड़ा थमता है, वहां जलकुंभी सड़ने लगी है, जिससे आस-पास के रहवासियों का जीना मुहाल हो गया है।
- मच्छरों का आतंक: यह हरी चादर अब मच्छरों और संक्रामक बीमारियों का सबसे बड़ा ब्रीडिंग ग्राउंड बन चुकी है।
लाखों का खेल, नतीजा 'शून्य'
हर बार जनआक्रोश बढ़ने पर नगर निगम जागा हुआ नाटक करता है। कुछ मजदूरों और मशीनों को लगाकर जलकुंभी निकालने का दिखावा शुरू होता है। लेकिन हकीकत यह है कि जलकुंभी को सिर्फ एक किनारे से हटाकर दूसरे किनारे पर छोड़ दिया जाता है या उसे पूरी तरह नष्ट नहीं किया जाता।
बड़ा सवाल: जलकुंभी की एक खासियत होती है कि अगर इसका एक छोटा सा हिस्सा भी पानी में रह जाए, तो यह कुछ ही दिनों में दोगुनी रफ्तार से दोबारा फैल जाती है। क्या नगर निगम के तकनीकी विशेषज्ञों को यह बुनियादी बात नहीं पता? या फिर जानबूझकर ऐसा आधा-अधूरा काम किया जाता है ताकि अगले साल फिर से 'सफाई बजट' पास कराने का मौका मिल सके?
क्या है इसका स्थाई इलाज? (जो निगम नहीं करना चाहता)
दुनिया भर में जलकुंभी से निपटने के कई आधुनिक और स्थाई तरीके अपनाए जा रहे हैं, लेकिन कटनी निगम प्रशासन पारंपरिक 'दिखावे की सफाई' से आगे नहीं बढ़ना चाहता।


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