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एथेनॉल क्रांति — देश की तरक्की या नया संकट?एथेनॉल वरदान या अभिशाप

भारत इन दिनों अपनी ऊर्जा नीति में एक बहुत बड़ा बदलाव कर रहा है। सड़क पर दौड़ने वाली गाड़ियों के पेट्रोल में अब 'एथेनॉल' (एक प्रकार का अल्कोहल fuel) मिलाया जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे कच्चे तेल का आयात कम होगा और किसानों की कमाई बढ़ेगी। लेकिन पर्यावरणविदों और ऑटो सेक्टर के विशेषज्ञों के बीच इसे लेकर चिंताएं भी गहराने लगी हैं।

​1. एथेनॉल बनाने में क्या इस्तेमाल होता है? (कच्चा माल)

​एथेनॉल मुख्य रूप से खेती के प्रोडक्ट्स और उनके बचे-खुचे हिस्सों से बनता है। भारत में इसके लिए दो बड़े सोर्सेज हैं:

  • गन्ने का रस और शीरा (Molasses): चीनी मिलों से निकलने वाला बाय-प्रोडक्ट।
  • अनाज (Grains): खराब हो चुके चावल, मक्का (Maize) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास मौजूद सरप्लस अनाज।

​2. सिक्के का पहला पहलू: एथेनॉल से होने वाले फायदे

​अगर सही तरीके से लागू किया जाए, तो एथेनॉल भारत की अर्थव्यवस्था में सचमुच 'चार चांद' लगा सकता है। इसके मुख्य फायदे निम्नलिखित हैं:

  • भारी विदेशी मुद्रा की बचत: भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 85% कच्चा तेल (Crude Oil) विदेशों से खरीदता है। पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने से देश के हर साल करीब ₹30,000 करोड़ से ₹1,00,000 करोड़ (आयात की मात्रा के अनुसार) बच सकते हैं।
  • किसानों को सीधा लाभ: गन्ना और मक्का उगाने वाले किसानों को अपनी फसल का एक नया और तय बाजार मिल गया है। चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, जिससे किसानों का बकाया भुगतान समय पर हो सकेगा।
  • कम प्रदूषण: एथेनॉल में ऑक्सीजन होती है, जिससे ईंधन पूरी तरह जलता है। साधारण पेट्रोल के मुकाबले यह कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और हाइड्रोकार्बन के उत्सर्जन को 30% से 50% तक कम कर देता है, जिससे शहरों की हवा साफ होती है।

​3. सिक्के का दूसरा पहलू: एथेनॉल से होने वाले नुकसान और चिंताएं

​हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। एथेनॉल के अंधाधुंध उत्पादन से देश को कुछ बड़ी हानियाँ और चुनौतियाँ भी झेलनी पड़ रही हैं:

  • 'थाली बनाम ईंधन' (Food vs Fuel) का संकट: जब अनाज और गन्ने का इस्तेमाल गाड़ियां चलाने के लिए होने लगेगा, तो इंसानों और पशुओं के खाने के लिए इनकी कमी हो सकती है। उदाहरण के लिए, एथेनॉल की भारी मांग के कारण भारत साल 2024 में मक्के का निर्यातक (Exporter) से आयातक (Importer) बन गया, जिससे पोल्ट्री (मुर्गी पालन) उद्योग के लिए दाना महंगा हो गया।
  • पानी की भारी बर्बादी: गन्ना एक ऐसी फसल है जिसे बहुत ज्यादा पानी चाहिए होता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 1 लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 2,860 लीटर पानी की खपत होती है। इससे महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भूजल (Groundwater) का स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा सकता है।
  • आपकी गाड़ी के इंजन पर असर: जो गाड़ियां साल 2023 से पहले की बनी हैं, उनके इंजन 20% एथेनॉल वाले पेट्रोल के लिए डिजाइन नहीं किए गए हैं। एथेनॉल थोड़ा संक्षारक (corrosive/जंग लगाने वाला) होता है, जिससे पुरानी गाड़ियों के पाइप और इंजन पार्ट्स जल्दी खराब हो सकते हैं। साथ ही, उपभोक्ताओं को गाड़ी के माइलेज में 3% से 7% की गिरावट देखने को मिल रही है।

​    ​फैसला क्या है: चार चांद या बर्बादी?

एथेनॉल भारत को 'बर्बाद' कतई नहीं करेगा, लेकिन आंख मूंदकर इस पर भरोसा करना भी ठीक नहीं है। यदि हम केवल गन्ने और खाने वाले अनाज पर निर्भर रहे, तो पानी और भोजन का संकट खड़ा हो जाएगा।

​इसका असली समाधान 'सेकंड जनरेशन (2G) एथेनॉल' में है, यानी जो पराली, गन्ने की खोई (bagasse) और कचरे से बनाया जाए। अगर सरकार कचरे से एथेनॉल बनाने पर ज़ोर दे और ऑटो कंपनियां 'फ्लेक्स-फ्यूल' (जो 100% एथेनॉल पर चल सकें) इंजन तेज़ी से लाएं, तो यह देश की इकॉनमी के लिए गेम-चेंजर साबित होगा।

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