Chief editor-neeraj pandey 

 खाकी के न्याय पर 'भारी' हाइवा!

कटनी के बड़वारा और बरही  में पुलिसिया कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल; आखिर ट्रैक्टरों पर ही क्यों गिरती है गाज, हाइवा को किसका संरक्षण?

कटनी। जिले के बड़वारा, बरही और क्षेत्र में इन दिनों अवैध रेत उत्खनन और परिवहन को लेकर पुलिस प्रशासन की कार्रवाई चर्चा और विवादों के केंद्र में है। क्षेत्र में लगातार हो रही कार्रवाई के आंकड़ों को अगर ध्यान से देखें, तो एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर पैटर्न सामने आता है। पुलिस द्वारा जब्त किए जा रहे वाहनों में 90 से 95 प्रतिशत सिर्फ ट्रैक्टर-ट्रालियां शामिल हैं। ऐसे में अब आम जनता और जागरूक नागरिकों के बीच यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या पुलिस की मुस्तैदी सिर्फ छोटे मोहरों पर चलती है, और बड़े मगरमच्छों (हाइवा चालकों) को अभयदान मिला हुआ है?

सवालों के घेरे में 'चुनिंदा' कार्रवाई

​स्थानीय सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो बड़वारा, बरही और बुझा के रेत घाटों से रोजाना दर्जनों भारी-भरकम हाइवा (डंपर) टनों रेत लादकर बेखौफ गुजरते हैं। लेकिन जब भी पुलिसिया कार्रवाई की खबरें या प्रेस नोट सामने आते हैं, उनमें सिर्फ गरीब या मध्यमवर्गीय ग्रामीणों के ट्रैक्टर-ट्रालियों के जब्त होने का जिक्र होता है।

बड़ा सवाल: क्या रेत का अवैध कारोबार सिर्फ ट्रैक्टरों के भरोसे चल रहा है? या फिर भारी-भरकम हाइवा वाहनों को किसी रसूखदार का 'कवच' प्राप्त है, जिसके आगे खाकी भी अपनी आंखें मूंद लेती है?








ग्रामीणों और छोटे वाहन मालिकों में पनप रहा आक्रोश

​इस दोहरे मापदंड को लेकर स्थानीय लोगों और छोटे ट्रैक्टर मालिकों में भारी असंतोष है। नाम न छापने की शर्त पर एक ट्रैक्टर मालिक ने बताया:

"अगर हम अपने घर या स्थानीय काम के लिए एक ट्राली रेत ले जाएं, तो पुलिस तुरंत घेराबंदी कर लेती है। वहीं, रसूखदारों के दर्जनों हाइवा पुलिस चौकियों और थानों के सामने से शान से निकलते हैं, उन्हें कोई हाथ तक नहीं लगाता। यह कार्रवाई नहीं, बल्कि संरक्षण का खेल है।"


ये ५ गंभीर सवाल, जिनका जवाब देना मुश्किल है:

  1. समानता का कानून कहाँ है? जब नियम सबके लिए बराबर हैं, तो जब्ती की कार्रवाई में ९५% हिस्सेदारी सिर्फ ट्रैक्टरों की ही क्यों?
  2. सड़कें खराब करने वाले हाइवा पर मेहरबानी क्यों? ओवरलोड हाइवा न सिर्फ राजस्व को चूना लगा रहे हैं, बल्कि बड़वारा और बरही की सड़कों 2को भी मलबे में तब्दील कर रहे हैं। फिर भी इन्हें खुली छूट क्यों?
  3. मुखबिर तंत्र सिर्फ छोटे वाहनों पर सक्रिय क्यों? पुलिस का तथाकथित 'मुखबिर तंत्र' सिर्फ ट्रैक्टरों की लोकेशन ही पुलिस तक क्यों पहुंचाता है? क्या हाइवा इन्हें दिखाई नहीं देते?
  4. क्या यह महज 'कोटा' पूरा करने की कवायद है? क्या आला अधिकारियों के दबाव में सिर्फ कागजी कोरम और जब्ती की संख्या (कोटा) पूरी करने के लिए ट्रैक्टरों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है?
  5. सरपरस्ती किसकी? क्या इस पूरे खेल के पीछे कोई बड़ा सफेदपोश या विभाग के ही कुछ विभीषण शामिल हैं, जो हाइवा ऑपरेटरों से 'महीने का हिसाब' तय रखते हैं?

निष्कर्ष: साख पर बट्टा लगाती 'चुनिंदा' कार्रवाई

​बड़वारा, बरही और बुझा में हो रही इस तरह की एकतरफा कार्रवाई से न केवल पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति का भी मखौल उड़ रहा है। यदि प्रशासन सच में अवैध उत्खनन रोकना चाहता है, तो उसे ट्रैक्टरों के साथ-साथ उन 'हाइवा सिंडिकेट' पर भी नकेल कसनी होगी जो रात के अंधेरे में नदियों का सीना चीर रहे हैं।

​अब देखना यह है कि इस गंभीर विसंगति पर कटनी के उच्च अधिकारी संज्ञान लेते हैं या फिर 'हाइवा को वीआईपी ट्रीटमेंट' और 'टैक्टर पर एक्शन' का यह खेल यूं ही अनवरत चलता रहेगा।



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