कटनी जनपद में 'सिस्टम' पर भारी रोजगार सहायक, 15 वर्षों से एक ही जगह तैनाती से बढ़ी 'मोनोपोली'
मुख्य सुर्खियां
- कटनी जनपद में ट्रांसफर पॉलिसी बेअसर: 12 से 15 साल से एक ही पंचायत में कुंडली मारकर बैठे हैं कई रोजगार सहायक।
- सरपंचों का दर्द: "हमारी सुनते ही नहीं, आदेशों की अवहेलना आम बात; आखिर प्रशासन की चुप्पी का राज क्या है?"
- बड़ा खुलासा: उपयंत्री (Sub Engineer) और रोजगार सहायक की जुगलबंदी! सरपंच-सचिव को अंधेरे में रखकर फर्जी मस्टर रोल और कागजी खेल का खेल जारी।
विशेष ब्यूरो, कटनी।
ग्रामीण विकास की रीढ़ मानी जाने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) कटनी जनपद पंचायत की कई ग्राम पंचायतों में विवादों और असंतोष का केंद्र बन चुकी है। वजह है— वर्षों से एक ही जगह जमे ग्राम रोजगार सहायकों (GRS) का मजबूत हो चुका रसूख। जनपद के तहत आने वाली कई ग्राम पंचायतों में रोजगार सहायक पिछले 12 से 15 वर्षों से भी अधिक समय से अंगद की तरह पैर जमाए बैठे हैं। नियम और प्रशासनिक शुचिता को ताक पर रखकर दी गई इस 'स्थिरता' ने अब तानाशाही और कथित भ्रष्टाचार का रूप ले लिया है, जिससे ग्रामीण व्यवस्था चरमरा गई है।
सरपंचों की खुली अवहेलना, पंचायतों में गृहयुद्ध जैसी स्थिति
कटनी जनपद की कई पंचायतों के सरपंचों ने नाम न छापने की शर्त पर अपना दर्द बयां किया है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि इतने लंबे समय तक एक ही जगह रहने के कारण इन रोजगार सहायकों की अपनी 'मोनोपोली' (एकाधिकार) स्थापित हो चुकी है। स्थिति यह है कि जनता द्वारा चुने गए सरपंचों के जायज आदेशों को भी ये रोजगार सहायक ठेंगा दिखाने से नहीं चूकते।
स्थानीय स्तर पर इस रवैये के कारण आए दिन पंचायतों में विवाद और असंतोष की स्थितियां निर्मित हो रही हैं। सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र में जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि बड़ा है या वर्षों से एक ही कुर्सी पर जमा संविदा कर्मचारी?
अंदरूनी सांठगांठ: सरपंच-सचिव को भनक तक नहीं, खुल जाते हैं काम!
सूत्रों से मिली बेहद चौंकाने वाली जानकारी के मुताबिक, कुछ ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार का एक नया और समानांतर मॉडल चल रहा है। इसमें रोजगार सहायक और उपयंत्री (सब-इंजीनियर) की कथित जुगलबंदी सामने आई है।
कैसे होता है खेल:
सूत्रों का दावा है कि बिना सरपंच या सचिव की जानकारी के, तकनीकी स्वीकृति और मस्टर रोल का ऑनलाइन खेल खेलकर सीधे रोजगार के नए कार्य खोल दिए जाते हैं। कागजों पर या चहेते मजदूरों को लगाकर काम दिखा दिया जाता है, कई बार तो फर्जी हाजिरी (Fake Attendance) के दम पर सरकारी राशि का आहरण भी कर लिया जाता है। इस पूरे खेल की भनक ग्राम सरकार के मुखिया (सरपंच) और प्रशासनिक अधिकारी (सचिव) तक को नहीं लगने दी जाती।
आखिर तबादलों पर प्रशासन मौन क्यों? क्या ट्रांसफर सरकार के लिए चुनौती है?
मध्य प्रदेश में समय-समय पर प्रशासनिक फेरबदल और तबादला नीतियां आती हैं, लेकिन ग्राम रोजगार सहायकों के मामले में कटनी प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
- चुनौती या राजनैतिक संरक्षण? क्या इन रोजगार सहायकों का ट्रांसफर करना प्रशासन या सरकार के लिए इतनी बड़ी चुनौती बन गया है कि वे छूने से भी डर रहे हैं? या फिर इन्हें पर्दे के पीछे से किसी बड़े राजनैतिक रसूख का संरक्षण प्राप्त है?
- समीक्षा क्यों नहीं? नियमानुसार, वित्तीय पारदर्शिता बनाए रखने के लिए किसी भी शासकीय या अर्ध-शासकीय कर्मचारी को एक ही संवेदनशील पद पर लंबे समय तक नहीं रखा जाना चाहिए। फिर रोजगार सहायकों को 15 साल की 'छूट' क्यों?
- शिकायतों का क्या हुआ? जब कई पंचायतों से लगातार विवाद और असंतोष की खबरें जिला प्रशासन और जनपद पंचायत सीईओ तक पहुंच रही हैं, तो इन पर अब तक कोई ठोस दंडात्मक या सुधारात्मक कदम क्यों नहीं उठाया गया?
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की मांग: 'जल्द हो सामूहिक तबादला'
कटनी जनपद के जागरूक नागरिकों और पीड़ित सरपंचों ने अब जिला कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ से इस मामले में सीधे हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि जब तक इन रोजगार सहायकों का ब्लॉक या जिला स्तर पर सामूहिक रूप से तबादला नहीं किया जाता, तब तक पंचायतों में न तो पारदर्शिता आएगी और न ही सरपंच-सचिव समन्वय से काम कर पाएंगे।
अब देखना यह है कि इस गंभीर और मस्टर रोल के इस कथित 'कागजी सिंडिकेट' के उजागर होने के बाद कटनी का जिला प्रशासन कुंभकर्णी नींद से जागता है या फिर रोजगार सहायकों की यह मोनोपोली यूं ही बदस्तूर जारी रहेगी।
सवाल प्रशासन से
हमारा सवाल: मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना को भ्रष्टाचार से बचाने के लिए क्या शासन स्तर पर रोजगार सहायकों के लिए कोई अनिवार्य रोटेशन (तबादला) पॉलिसी लागू नहीं होनी चाहिए? यदि हां, तो कटनी में इसका पालन कब होगा?

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