कटनी आरटीओ की कार्यशैली पर उठे सवाल—नियम ताक पर और प्राइवेट 'सिंडिकेट' का दबदबा?
कटनी: क्या कटनी परिवहन विभाग (RTO) कानून का पालन कराने के बजाय, नियमों की अनदेखी का केंद्र बनता जा रहा है? जिले की सड़कों पर दौड़ती जर्जर बसें और आरटीओ दफ्तर की कार्यप्रणाली को लेकर शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म है। आम जनता से लेकर वाहन चालकों तक, हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा है: आखिर कटनी आरटीओ में हो क्या रहा है?
15 साल पुरानी बसों को 'अभयदान'? कार्रवाई के नाम पर महज़ खानापूर्ति
नियम स्पष्ट हैं—15 साल से अधिक पुरानी कमर्शियल बसें सड़क पर नहीं दौड़ सकतीं। बावजूद इसके, कटनी जिले की सड़कों पर ऐसी बसों का संचालन धड़ल्ले से जारी है। आरोप है कि जब भी इन बसों पर कार्रवाई की बात आती है, तो एक 'पकड़ो और छोड़ो' का खेल शुरू हो जाता है। कार्रवाई के नाम पर वाहनों को रोका तो जाता है, लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें बिना किसी ठोस दंड के छोड़ दिया जाता है, जिससे विभाग की मंशा पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
जबलपुर का 'विवादित ट्रैक रिकॉर्ड', अब कटनी में वही दोहराव?
वर्तमान आरटीओ अधिकारी का पिछला कार्यकाल जबलपुर में रहा है। जबलपुर में रहते हुए भी उनकी कार्यप्रणाली कई बार विवादों और सुर्खियों का हिस्सा रही। अब वही 'अंदाज' कटनी में देखने को मिल रहा है। स्थानीय लोग और वाहन चालक दबी जुबान में कह रहे हैं कि जबलपुर की विवादित कार्यशैली का असर अब कटनी के परिवहन व्यवस्था पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
सबसे बड़ा सवाल: आरटीओ टीम के साथ प्राइवेट कर्मचारियों का क्या काम?
सबसे गंभीर और चौंकाने वाला पहलू यह है कि सड़कों पर वाहनों की जांच के दौरान विभाग के आधिकारिक कर्मचारियों के साथ प्राइवेट लड़के (प्राइवेट कर्मचारी) भी तैनात रहते हैं।
- कानूनी प्रश्न: क्या किसी भी सरकारी कार्यवाही में प्राइवेट व्यक्तियों का हस्तक्षेप कानूनी रूप से वैध है?
- नैतिक प्रश्न: क्या आरटीओ की वर्दी का रसूख प्राइवेट लोगों के हाथों में सौंप दिया गया है?
जब आरटीओ विभाग के पास अपनी आधिकारिक टीम है, तो प्राइवेट लड़कों का सड़कों पर वाहनों को रोकना न केवल संदिग्ध है, बल्कि यह भ्रष्टाचार और अवैध वसूली की आशंकाओं को भी जन्म देता है।
अब जनता पूछ रही है जवाब
क्या प्रशासन इस 'प्राइवेट सिंडिकेट' पर लगाम लगाएगा? क्या 15 साल पुरानी बसों के संचालन को लेकर कोई ठोस कार्रवाई की जाएगी? कटनी की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। अब समय आ गया है कि उच्च अधिकारियों को इस 'संदेहास्पद प्रणाली' की जांच करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि परिवहन विभाग अपनी गरिमा और कानून की मर्यादा के दायरे में रहकर काम करे।
इस रिपोर्ट में उठाए गए बिंदु आम जनमानस की चर्चा और स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित हैं। हम इस विषय पर विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की प्रतिक्रिया का स्वागत करते हैं।

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