जनसुनवाई: उम्मीदों का मेला या सिर्फ कागज़ी दिलासा?
आवेदनों की संख्या का ढिंढोरा, लेकिन निराकरण के आंकड़ों पर रहस्यमयी चुप्पी
मुख्य बिंदु:
- दूर-दराज से भाड़े के पैसे जुटाकर आते हैं फरियादी।
- अगले दिन अखबारों में छपती है सिर्फ आवेदनों की संख्या।
- नियमों के मुताबिक ७ दिनों में निराकरण और उसका प्रकाशन बेहद ज़रूरी।
कटनी
शासन और प्रशासन की मंशा बहुत साफ थी—एक ऐसा मंच, जहां जनता और अधिकारी आमने-सामने हों और समस्याओं का ऑन-द-स्पॉट या तय समय सीमा में निपटारा हो सके। इसी मंशा के साथ शुरू हुई थी 'जनसुनवाई'। लेकिन आज हालात देखकर ऐसा लगता है कि जनसुनवाई महज़ एक प्रशासनिक औपचारिकता और दिलासा देने का केंद्र बनकर रह गई है।
आंकड़ों की बाज़ीगरी, हकीकत में नतीजा सिफ़र
हर मंगलवार या जनसुनवाई के दिन मीडिया में बड़े-बड़े आंकड़ों के साथ खबरें प्रकाशित होती हैं कि "आज जनसुनवाई में आए इतने सौ आवेदन", या "कलेक्टर ने सुनीं इतनी समस्याएं"। लेकिन इन आवेदनों का अगले सात दिनों में क्या हुआ? कितने पीड़ितों को न्याय मिला और कितने आवेदनों का 'संतुष्टिपूर्ण' निराकरण हुआ? इस पर प्रशासन और मीडिया दोनों स्तरों पर एक अजीब सी खामोशी छा जाती है। नतीजा यह होता है कि जनसुनवाई की महत्ता सिर्फ कागज़ों और तस्वीरों तक सिमट कर रह गई है।
"हम सुबह भूखे-प्यासे घर से निकलते हैं कि कलेक्टर साहब हमारी सुनेंगे। आवेदन जमा हो जाता है, पावती मिल जाती है, लेकिन हफ़्तों बीत जाने के बाद भी समस्या वहीं की वहीं रहती है।"
— जनसुनवाई में आए एक परेशान बुजुर्ग की ज़ुबानी।
नियमों की अनदेखी: पारदर्शिता का अभाव
नियमों के मुताबिक, जनसुनवाई में आने वाली हर शिकायत को एक निश्चित समय सीमा (आमतौर पर ७ दिवस) के भीतर हल किया जाना अनिवार्य है। जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उनकी दी गई अर्जियों पर क्या कार्रवाई हुई। यदि सरकार और प्रशासन वाकई इस व्यवस्था को लेकर गंभीर हैं, तो उन्हें आवेदनों की संख्या के साथ-साथ 'निराकरण दर' को भी मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक करना चाहिए।
क्यों ज़रूरी है निराकरण का प्रकाशन?
- अधिकारियों की बढ़ेगी जवाबदेही: जब अधिकारियों को पता होगा कि उनके विभाग की पेंडेंसी (लंबित मामले) का ब्यौरा अखबारों में छपेगा, तो वे शिकायतों को ठंडे बस्ते में नहीं डालेंगे।
- जनता का बढ़ेगा विश्वास: यदि लोगों को पता चलेगा कि पिछले हफ्ते आए १०० आवेदनों में से ८० का सफल निराकरण हो गया है, तो व्यवस्था पर उनका भरोसा और मजबूत होगा।
- भ्रष्टाचार पर लगेगी लगाम: पारदर्शिता आने से बिचौलियों और लापरवाही बरतने वाले बाबुओं के खेल पर रोक लगेगी।
हमारा नज़रिया।
सरकार को इस ओर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। जनसुनवाई को 'सिर्फ दिलासा' बनने से रोकने के लिए एक कड़ा नियम बनाना होगा। प्रशासन को हर हफ्ते एक 'प्रोग्रेस रिपोर्ट' या 'संतुष्टि सूचकांक' जारी करना चाहिए, जिसे मीडिया में प्रमुखता से जगह मिले। जब तक समस्याओं के निवारण का लेखा-जोखा सामने नहीं आएगा, तब तक दूर-दराज से आने वाले गरीब ग्रामीणों की उम्मीदें इसी तरह दम तोड़ती रहेंगी और जनसुनवाई महज़ एक 'फाइल बढ़ाने' का जरिया बनी रहेगी। अब वक्त आ गया है कि 'आवेदनों की गिनती' छोड़कर 'समाधान की गिनती' शुरू की जाए।

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