विशेष रिपोर्ट: ‘तेल बचाने’ के नारों के बीच सरकारी पहियों में फुंकते लाखों, कटनी से देश तक सुलगते सवाल!
कटनी।
एक तरफ केंद्र की मोदी सरकार लगातार देशवासियों से ईंधन बचाने, पर्यावरण को सुरक्षित रखने और ग्रीन एनर्जी अपनाने की अपील कर रही है; विज्ञापन और अभियानों के जरिए जनता को बूंद-बूंद तेल की कीमत समझाई जा रही है। लेकिन दूसरी तरफ, जमीनी हकीकत इन दावों को मुंह चिढ़ाती नजर आ रही है। सूत्रों से मिली एक चौंकाने वाली जानकारी के अनुसार, कटनी नगर निगम के वाहनों ने महज एक महीने के भीतर लगभग 17 से ₹18 लाख का ईंधन (डीजल-पेट्रोल) फूंक दिया है।
यह आंकड़ा न सिर्फ हैरान करने वाला है, बल्कि व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी बड़े गंभीर सवाल खड़े करता है।
एक शहर की यह तस्वीर, तो पूरे देश का क्या होगा हाल?
कटनी जैसे एक सीमित दायरे और आबादी वाले जिले में अगर नगर निगम की गाड़ियों का मासिक ईंधन खर्च ₹18 लाख के आसपास पहुंच रहा है, तो जरा कल्पना कीजिए कि देश के महानगरों (दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु) और हजारों अन्य नगर निगमों व नगर पालिकाओं में रोजाना 'शहरी व्यवस्था' के नाम पर कितने करोड़ रुपए का ईंधन धुएं में उड़ाया जा रहा होगा?
यदि इस ढर्रे को पूरे देश के पैमाने पर देखा जाए, तो यह आंकड़ा रोजाना अरबों रुपयों तक पहुंच सकता है। जनता की गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा केवल सरकारी गाड़ियों के फेरों और कथित दौरों में जल रहा है।
सुलगते सवाल: मॉनिटरिंग पर क्यों है 'सन्नाटा'?
सूत्रों के हवाले से आई इस खबर के बाद कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब जनता जानना चाहती है:
- क्या वाकई जरूरत थी?: क्या नगर निगम के वाहनों का यह उपयोग पूरी तरह जनता की सहूलियत (जैसे कचरा प्रबंधन, निरीक्षण आदि) के लिए हुआ, या इसमें 'अनावश्यक दौरों' की भी बड़ी भूमिका रही है?
- लॉग बुक का सच क्या है?: क्या इन सरकारी वाहनों की लॉग बुक (ईंधन और किलोमीटर का हिसाब) का ईमानदारी से ऑडिट किया जाता है?
- नीतियों में दोहरापन क्यों?: जब सरकार का ध्यान ई-व्हीकल्स (EV) और ईंधन की बचत पर है, तो स्थानीय स्तर पर नगर निगम इस दिशा में कदम उठाने में इतनी सुस्त क्यों हैं?
बड़ा विरोधाभास
"एक तरफ आम नागरिक महंगे पेट्रोल-डीजल की मार झेलते हुए एक-एक किलोमीटर का हिसाब रखता है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी तंत्र में 'सूत्रों के अनुसार' मिल रही फिजूलखर्ची की यह रफ्तार व्यवस्था की गंभीरता पर सवालिया निशान लगाती है।"
अब जरूरत है 'सख्त ऑडिट' और पारदर्शिता की
यह जानकारी भले ही आधिकारिक मुहर की मोहताज हो, लेकिन इसने एक बेहद महत्वपूर्ण बहस को जन्म दे दिया है। अगर देश को सचमुच 'आत्मनिर्भर' और 'ऊर्जा-बचत' के रास्ते पर ले जाना है, तो शुरुआत इन स्थानीय निकायों से ही करनी होगी। कटनी नगर निगम के इस कथित ईंधन खर्च की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और देश भर के नगरीय निकायों के ईंधन बजट को 'पब्लिक डोमेन' में पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।
वरना, जनता यही पूछती रहेगी—"साहब! तेल बचाने के नियम क्या सिर्फ हमारे लिए हैं?"

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