कटनी: 'सुस्ती और चुस्ती' के फेर में फंसी ग्राम पंचायतें, PHE विभाग का एक ही राग— "समय नहीं है!"

विशेष रिपोर्ट

कटनी। सरकारें बदलती हैं, योजनाएं बदलती हैं, और दावों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स भी बदलते हैं। लेकिन अगर कुछ नहीं बदलता, तो वह है कटनी के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग का ढर्रा। ग्रामीण क्षेत्रों में नल-जल और पेयजल योजनाओं को अमलीजामा पहनाने की जिम्मेदारी जिस विभाग पर है, वह इन दिनों खुद 'समय की कमी' के संकट से जूझ रहा है। आलम यह है कि विभाग की कभी भारी सुस्ती तो कभी अचानक जागी चुस्ती के बीच जिले की कई ग्राम पंचायतों के विकास कार्य अधर में लटके हैं।

​जब इस सुस्ती और लेत-लतीफी को लेकर विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से बात की जाती है, तो उनका बेहद घिसा-पीटा और गैर-जिम्मेदाराना जवाब सामने आता है— "वर्तमान में अभी हमारे पास थोड़ा समय की कमी है।"

बड़ा सवाल: जनता के टैक्स से सैलरी, फिर समय की कमी कैसे?

​अब सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी तंत्र में 'समय की कमी' जैसा कोई कानूनी बहाना हो सकता है? अधिकारी और कर्मचारी जनता की सेवा और तय समय पर काम पूरा करने के लिए ही सरकार से हर महीने मोटा वेतन (सैलरी) लेते हैं। अगर काम करने के लिए ही पैसा लिया जा रहा है, तो फिर पंचायतों की फाइलें महीनों तक दबाकर रखने के लिए 'समय की कमी' का रोना क्यों रोया जाता है?

तकनीकी स्वीकृति (TS) की कछुआ चाल

​ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की समस्या को दूर करने के लिए पंचायतों द्वारा जो प्रस्ताव भेजे जाते हैं, उन्हें महीनों तक तकनीकी स्वीकृति (Technical Sanction) नहीं मिलती। इंजीनियरों और आला अधिकारियों के टेबल पर फाइलें धूल खा रही हैं। पंचायतों के जनप्रतिनिधि चक्कर काट-काट कर थक चुके हैं, लेकिन तकनीकी स्वीकृति की हरी झंडी है कि मिलने का नाम नहीं ले रही।

काम पूरा, तो मूल्यांकन और CC जारी करने में आनाकानी क्यों?

​कहानी सिर्फ तकनीकी स्वीकृति पर ही नहीं रुकती। जिन पंचायतों ने कड़ी मशक्कत के बाद जैसे-तैसे काम पूरे करवा भी लिए हैं, वहां एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है।

  • मूल्यांकन (Evaluation) में देरी: इंजीनियर मौके पर जाकर कार्य का मूल्यांकन करने को तैयार नहीं हैं।
  • कार्य पूर्ति प्रमाण पत्र (CC) पर कुंडली: बिना कार्य पूर्ति प्रमाण पत्र (Completion Certificate) के पंचायतों का भुगतान अटका हुआ है, जिससे स्थानीय स्तर पर निर्माण कार्य करने वाले मजदूर और वेंडर परेशान हैं।
  • सवाल यह है कि क्या यह वाकई 'समय की कमी' है या फिर वजह कुछ और है? ग्रामीण गलियारों में यह चर्चा आम है कि जब तक विभाग के 'अघोषित नियमों' का पालन नहीं होता, तब तक अधिकारियों के पास समय की भारी कमी रहती है। जैसे ही 'शर्तें' पूरी होती हैं, विभाग की सुस्ती अचानक चुस्ती में बदल जाती है और फाइलें हवा की रफ्तार से दौड़ने लगती हैं।


    जनता प्यासी, जिम्मेदार बेपरवाह

    ​PHE विभाग की इस कार्यप्रणाली का सीधा असर कटनी के ग्रामीण इलाकों की जनता पर पड़ रहा है। गर्मी बीतने को है और जल जीवन मिशन के तहत मिलने वाला पानी आज भी कई गांवों के लिए सपना बना हुआ है।

    ​अब देखना यह होगा कि कटनी जिला प्रशासन और वरिष्ठ अधिकारी इस 'समय की कमी' वाले बहानेबाज तंत्र पर कब तक एक्शन लेते हैं, या फिर ग्रामीण इसी तरह पानी और न्याय दोनों के लिए तरसते रहेंगे।


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