विशेष रिपोर्ट: सरकारी काम, सरकारी पैसा... फिर पंचायतों पर जीएसटी का 'टैक्स टेरर' क्यों?

कटनी

मुख्य बिंदु:

  • विडंबना: जब काम शासन का है और फंड भी शासन का, तो टैक्स किस बात का?
  • असर: टैक्स के बोझ और कागजी कार्रवाई से गांवों का विकास ठप।
  • सटीक सवाल: क्या स्वायत्त संस्थाओं को आत्मनिर्भर बनाने का यही तरीका है?

सरकारी जेब से निकला पैसा, घूमकर फिर सरकारी खजाने में!

​लोकतंत्र की सबसे छोटी और सबसे महत्वपूर्ण इकाई 'ग्राम पंचायतें' आज एक अजीबोगरीब वित्तीय चक्रव्यूह में फंसी हुई हैं। ग्रामीण भारत के विकास का दावा करने वाली सरकारें एक हाथ से पंचायतों को विकास निधि (Funds) देती हैं, और दूसरे हाथ से 'जीएसटी' (GST) और 'एसजीएसटी' (SGST) के रूप में उस राशि का एक बड़ा हिस्सा वापस खींच लेती हैं।

​यह किसी विडंबना से कम नहीं है कि जब संस्था शासन की है, नीति शासन की है, काम शासन का हो रहा है और उसमें लगने वाला पैसा भी शासन की ही संचित निधि से आ रहा है, तो फिर इस प्रक्रिया पर वस्तु एवं सेवा कर (GST) लगाना कहां तक न्यायसंगत है?

कागजों में उलझा 'प्रधान' और 'पंचायती राज'

​पंचायती राज व्यवस्था का मूल उद्देश्य सत्ता और विकास का विकेंद्रीकरण करना था। लेकिन आज हकीकत यह है कि एक ग्रामीण जनप्रतिनिधि (ग्राम प्रधान या सरपंच) विकास कार्य कराने से ज्यादा इस बात से परेशान रहता है कि जीएसटी का रिटर्न कैसे भरा जाए, इनवॉइस कैसे जनरेट हो और वेंडर्स से टैक्स का तालमेल कैसे बिठाया जाए।

"हम कोई व्यावसायिक कंपनी या मुनाफा कमाने वाली संस्था नहीं हैं। हम सरकार के निर्देश पर गांवों में नाली, खड़ंजा, स्कूल और सामुदायिक भवन बनवाते हैं। इस जनहित के काम पर व्यापारिक टैक्स लगाना समझ से परे है।"

पंचायतो का कहना है 

नियमों के विरोधाभास का गणित

​यदि कानूनी और तार्किक दृष्टि से देखा जाए, तो जीएसटी मुख्य रूप से 'आर्थिक लाभ' या 'व्यावसायिक गतिविधियों' (Commerce and Business) पर लगाया जाता है।

  • सार्वजनिक कल्याण बनाम व्यापार: ग्राम पंचायतें कोई व्यावसायिक टर्नओवर पैदा नहीं करतीं। उनका काम लोक कल्याण (Public Welfare) है।
  • टैक्स पर टैक्स का बोझ: केंद्र या राज्य सरकार से मिलने वाली 15वें वित्त आयोग या राज्य वित्त आयोग की राशि पहले से ही करदाताओं के पैसे से आती है। उस राशि पर दोबारा भारी-भरकम जीएसटी काटना विकास कार्यों के बजट को 12% से 18% तक कम कर देता है। यानी, अगर किसी गांव को सड़क के लिए 10 लाख रुपये मिले, तो करीब 1.5 से 2 लाख रुपये सिर्फ टैक्स और औपचारिकता में चले जाते हैं।

विकास की रफ्तार पर 'जीएसटी का ब्रेक'

​इस दोहरे वित्तीय नियम का सीधा असर ग्रामीण विकास की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।

  1. गुणवत्ता से समझौता: टैक्स कटने के बाद बची हुई सीमित राशि में ठेकेदार या पंचायतें गुणवत्तापूर्ण काम नहीं करा पातीं।
  2. स्थानीय वेंडरों की दूरी: गांवों के छोटे-छोटे वेंडर (जैसे ईंट, बालू, सीमेंट सप्लाई करने वाले ग्रामीण) जीएसटी बिल देने में असमर्थ होते हैं, जिससे पंचायतों को काम कराने में व्यावहारिक दिक्कतें आती हैं।

 नीति में सुधार की तत्काल जरूरत

​भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243 ग्राम पंचायतों को स्थानीय स्वशासन की शक्ति देता है। यदि सरकार सचमुच ग्रामीण भारत को 'आत्मनिर्भर' और 'स्मार्ट विलेज' बनाना चाहती है, तो उसे इस नीतिगत विसंगति पर पुनर्विचार करना होगा।

​शासन के ही काम पर, शासन की निधि से जीएसटी वसूलना केवल कागजी राजस्व को बढ़ाने का एक भ्रामक तरीका है। वक्त आ गया है कि जीएसटी काउंसिल की बैठक में ग्राम पंचायतों द्वारा कराए जाने वाले सभी विकासात्मक और बुनियादी ढांचे के कार्यों को 'जीएसटी मुक्त' (Tax-Exempted) घोषित किया जाए, ताकि गांधी जी के 'ग्राम स्वराज' का सपना टैक्स के बोझ तले दम न तोड़े।




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