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 आंकड़ों की बाजीगरी में उलझी 'जनसुनवाई', समाधान या सिर्फ सरकारी दिखावा?

सुनवाई के दावों की हेडलाइन, पर समाधान की 'डेडलाइन' गायब: जनसुनवाई के आवेदनों का तो होता है ढिंढोरा, पर कितनों को मिला न्याय? इसका हिसाब कौन देगा?


ग्रामीणों का आरोप—सिर्फ रद्दी की टोकरी या फाइलों की शोभा बन रहे हैं शिकायती पत्र, 'संतुष्टि' के आंकड़ों पर प्रशासन ने साधी चुप्पी।


​सरकार की 'जनसुनवाई' योजना का मकसद था कि आखिरी छोर पर बैठे ग्रामीण और आम आदमी को दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें और उसकी समस्या का मौके पर ही निपटारा हो सके। हर हफ्ते प्रशासनिक अधिकारी बैठते हैं, कैमरे चमकते हैं, और अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बनती हैं—"जनसुनवाई में आए रिकॉर्ड 500 आवेदन, कलेक्टर ने दिए त्वरित निराकरण के निर्देश।"

​लेकिन इस चमकदार तस्वीर का एक दूसरा और स्याह पहलू भी है, जिसे अक्सर कालीन के नीचे सरका दिया जाता है।

सवाल आंकड़ों का: आने वाले आवेदन याद हैं, सुलझे हुए क्यों भूल जाते हैं?

​जनता का सीधा और वाजिब सवाल है कि यदि मीडिया में यह प्रकाशित हो सकता है कि आज कितने सौ लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे, तो यह क्यों नहीं प्रकाशित होता कि पिछले हफ्ते आए आवेदनों में से कितने लोगों की समस्याओं का 'संतुष्टिजनक' समाधान हुआ?

​अखबारों और सरकारी ज्ञापनों में आवेदनों की संख्या तो बढ़-चढ़कर दिखाई जाती है, लेकिन 'सफलता की दर' (Success Rate) पर पूरी तरह से पर्दा डाल दिया जाता है। क्या यह महज एक प्रचार का जरिया (PR Exercise) बनकर रह गया है?

ग्रामीणों का दर्द: "यह समाधान नहीं, छलावा है"

​ग्रामीण इलाकों से बसों का किराया लगाकर, अपना एक दिन का रोजगार छोड़कर आने वाले ग्रामीणों के लिए यह व्यवस्था अब एक उम्मीद कम और छलावा ज्यादा नजर आने लगी है।

​शिकायत कर्ताओ की जुबानी:

"हम तीन बार जनसुनवाई में पट्टा और नाली निर्माण की शिकायत लेकर आ चुके हैं। हर बार अधिकारी आवेदन लेकर कंप्यूटर पर एंट्री करवा देते हैं और पावती थमा देते हैं। अखबार में छप जाता है कि सुनवाई हुई। लेकिन जमीन पर हमारी समस्या जस की तस है। कोई देखने तक नहीं आता।"


जनता की पुरजोर मांग: अनिवार्य हो 'निराकरण रिपोर्ट' का प्रकाशन

​अब समय आ चुका है कि जनसुनवाई की इस व्यवस्था को खोखला होने से बचाया जाए। जनता और प्रबुद्ध वर्ग की मांग है कि:

  • समानुपातिक प्रकाशन - यदि मीडिया और सरकारी तंत्र 100 आवेदनों के आने की खबर छापता है, तो अगले ही हफ्ते यह भी छापना अनिवार्य किया जाए कि उनमें से कितने (जैसे 40 या 50) आवेदनों का संतुष्टिजनक निराकरण हुआ।
  • 'क्लोजर रिपोर्ट' की पारदर्शिता: सिर्फ कागजों पर फाइल को 'बंद'  न माना जाए। जब तक आवेदक खुद यह न लिख कर दे कि वह समाधान से संतुष्ट है, तब तक उसे लंबित माना जाए।
  • अधिकारियों की जवाबदेही: जिन विभागों के आवेदन हफ्तों तक लंबित रहते हैं, उनके प्रमुखों के नाम भी सार्वजनिक किए जाएं।

निष्कर्ष: दिखावे से आगे बढ़ने का वक्त

​अगर जनसुनवाई को वाकई 'जन' की 'सुनवाई' बनाना है, तो इसे केवल फोटो खिंचवाने और आंकड़ों की बाजीगरी का मंच बनने से रोकना होगा। प्रशासन को यह समझना होगा कि जनता पावती (Receipt) के टुकड़ों से नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं के ठोस समाधान से संतुष्ट होती है। अब वक्त आ गया है कि 'कितने आए' के साथ-साथ 'कितने सुलझे' का हिसाब भी सार्वजनिक पटल पर रखा जाए।

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