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खून-पसीने की कमाई पर 'पचहोत्रा' का डाका: तेंदूपत्ता मजदूरों का हक मार रहे भ्रष्ट प्रबंधक और अफसर

कमीशनखोरी का 'पांच फीसदी' खेल: आदिवासियों के बोनस पर कुंडली मारकर बैठे रसूखदार

जंगलों में कटीली राहों पर मजदूर, वातानुकूलित कमरों में अधिकारी बांट रहे मलाई


​(25/05/2026) कड़कड़ाती धूप, तपती जमीन और घने जंगलों के बीच जान जोखिम में डालकर हरा सोना (तेंदूपत्ता) बटोरने वाले गरीब आदिवासियों के हक पर एक बार फिर 'पचहोत्रा' का ग्रहण लग गया है। सरकार भले ही तेंदूपत्ता संग्रहण की दरें बढ़ाकर और करोड़ों का बोनस जारी कर अपनी पीठ थपथपा रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद खौफनाक और शर्मनाक है। समिति प्रबंधकों और वन विभाग के आला अधिकारियों की संगठित मिलीभगत से मजदूरों की खून-पसीने की गाढ़ी कमाई सरेआम लूटी जा रही है।

क्या है यह 'पचहोत्रा' का मायाजाल?

​ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में 'पचहोत्रा' शब्द इस समय भ्रष्टाचार का नया पर्याय बन चुका है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, तेंदूपत्ता फड़ से लेकर संग्रहण केंद्रों तक 'पांच प्रतिशत' (5%) से लेकर मोटी कट-मनी का एक गुप्त नेटवर्क काम कर रहा है। मजदूरों को उनकी मजदूरी और सरकार से मिलने वाले प्रोत्साहन बोनस का भुगतान करने के एवज में यह 'पचहोत्रा' (कमीशन) एडवांस में ही काट लिया जाता है या फिर नकद भुगतान के समय जबरन वसूल किया जाता है। जो मजदूर इस वसूली का विरोध करता है, उसे अगली बार पत्तियां जमा करने में प्रताड़ित किया जाता है।

कागजों पर 'हरा सोना', हकीकत में अंधकार

​क्षेत्रीय ग्रामीणों का आरोप है कि प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों के प्रबंधक और फड़ मुंशी मिलकर बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा कर रहे हैं।

  • फर्जी एंट्री का खेल: वास्तविक गरीब मजदूरों द्वारा जमा किए गए मानक बोरों की संख्या कागजों में कम दिखा दी जाती है, और बची हुई संख्या को अपने चहेतों या फर्जी नामों पर चढ़ाकर बोनस की मोटी रकम डकार ली जाती है।
  • क्वालिटी का बहाना: अच्छी और कड़क पत्तियों को भी 'खराब या कटी-फटी' बताकर रिजेक्ट कर दिया जाता है, और बाद में उन्हीं पत्तियों को ऊंचे दामों पर व्यापारियों को बेचकर प्रबंधक अपनी जेबें गर्म कर रहे हैं।

बोनस घोटालों की लंबी फेहरिस्त, कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति

​यह कोई पहला मामला नहीं है जब तेंदूपत्ता के खेल में आदिवासियों का हक मारा गया हो। हाल ही में राज्य के कई संभागों में करोड़ों रुपये के बोनस घोटाले उजागर हुए हैं, जिनमें जांच एजेंसियों ने भारतीय वन सेवा (IFS) के अधिकारियों से लेकर कई समिति प्रबंधकों को सलाखों के पीछे भेजा है। लेकिन इसके बावजूद निचली अदालतों और समितियों में बैठे बिचौलियों का हौसला पस्त नहीं हुआ है। अधिकारियों और प्रबंधकों का यह गठजोड़ इतना मजबूत है कि शिकायत करने के बावजूद जांच की फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं।

पसीने की कीमत पर अधिकारियों की 'ऐश'

​जंगलों में नंगे पैर, कटीले रास्तों और जंगली जानवरों के साये के बीच जो आदिवासी सुबह चार बजे से पत्तियां तोड़ते हैं, उन्हें मिलने वाला बोनस महीनों और सालों तक अटका रहता है। दूसरी ओर, उन्हीं के नाम पर आने वाले पैसों से वातानुकूलित कमरों में बैठे अधिकारी और रसूखदार प्रबंधक मलाई काट रहे हैं। सरकार द्वारा चलाए जा रहे 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' (DBT) को भी इन शातिर ठगों ने स्थानीय स्तर पर अंगूठा लगवाकर या बैंक प्रबंधकों से सांठगांठ कर बेअसर कर दिया है।

अब आर-पार की लड़ाई के मूड में मजदूर

​इस संगठित 'पचहोत्रा' लूट के खिलाफ अब अंदरूनी अंचलों के आदिवासियों और मजदूर संगठनों में भारी आक्रोश पनप रहा है। स्थानीय जनप्रप्रतिनिधियों और जागरूक ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि इस 'पचहोत्रा समिति' के प्रबंधकों और उनके पीछे खड़े भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ जल्द ही उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच और दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो उग्र जनआंदोलन किया जाएगा।

कार्यवाही की उम्मीद 

अब देखना यह है कि प्रशासन इस 'पांच फीसदी' के खूनी खेल को कब बंद करा पाता है, या फिर हमेशा की तरह गरीब की आवाज इस घने जंगल के सन्नाटे में ही दफन होकर रह जाएगी।

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