प्रशासन की नाक के नीचे 'कोर्ट' के आदेशों की धज्जियाँ: कटनी का राजस्व विभाग बना 'तमाशाबीन'
कटनी (मध्य प्रदेश):
कहने को तो प्रशासन का काम नियम और कानून व्यवस्था को बनाए रखना है, लेकिन कटनी का तहसीलदार कार्यालय इन दिनों किसी और ही ढर्रे पर चल रहा है। मामला ग्राम पंचायत केलवाड़ा का है, जहाँ 'अवैध अतिक्रमण' के खिलाफ प्रशासन की चुप्पी अब सवालिया निशान नहीं, बल्कि एक बड़ा कलंक बनती जा रही है। हैरानी की बात यह है कि जिस अतिक्रमण को माननीय उच्च न्यायालय (High Court) ने अवैध घोषित कर जमींदोज करने का आदेश दिया था, उसी सरकारी ज़मीन पर आज फिर से अवैध दुकानों का साम्राज्य खड़ा है।
पंचायत की रिपोर्ट रद्दी की टोकरी में!
केलवारा खुर्द ग्राम पंचायत और जनपद पंचायत कटनी द्वारा लगातार प्रतिवेदन और शिकायतें भेजी जा रही हैं, लेकिन तहसीलदार कार्यालय ने जैसे अपनी आँखें और कान दोनों बंद कर लिए हैं। जनपद पंचायत के प्रतिवेदन की कोई अहमियत नहीं रह गई है। क्या अब निचला प्रशासन इतना ताकतवर हो गया है कि वह चुनी हुई पंचायत और वरिष्ठ अधिकारियों की रिपोर्ट को रद्दी का टुकड़ा समझने लगा है?
शिक्षा के मंदिर पर अतिक्रमण का साया
खसरा नंबर 326/2 की ज़मीन और शासकीय माध्यमिक शाला की बाउंड्री से लगी तीन अवैध दुकानें प्रशासन की कार्यप्रणाली पर चीख-चीख कर सवाल पूछ रही हैं। जिस स्कूल की बाउंड्री से बच्चों का भविष्य जुड़ा है, वहां भू-माफियाओं का कब्जा है। पूर्व में हाई कोर्ट के आदेश पर इन दुकानों को तोड़ा गया था, लेकिन राजस्व विभाग की 'मेहरबानी' देखिए कि वे दुकानें फिर से तनकर खड़ी हो गई हैं।
क्या यह 'अवमानना' नहीं है?
न्यायालय के आदेश के बाद दोबारा अतिक्रमण होना सीधे तौर पर 'कोर्ट की अवमानना' की श्रेणी में आता है। ऐसे में तहसीलदार कार्यालय की खामोशी कई गहरे संदेह पैदा करती है:
- क्या राजस्व अमला किसी दबाव में है?
- या फिर अवैध दुकानदारों और विभाग के बीच कोई 'गुपचुप' समझौता हो चुका है?
- जनपद पंचायत और ग्राम पंचायत की शिकायतों को नजरअंदाज करने की हिम्मत विभाग को कहाँ से मिल रही है?
सवाल प्रशासन से
यदि समय रहते ज़िला कलेक्टर ने इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह मामला न केवल जन-आक्रोश का कारण बनेगा, बल्कि न्यायालय की गरिमा को भी ठेस पहुँचाएगा। केलवारा खुर्द की जनता पूछ रही है— साहब! आप रक्षक हैं या भक्षक?


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