​'हरा सोना' लूट रहा सिंडिकेट: तेंदू पत्ता खरीदी में 'पचहोत्रा' बना भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा औजार

विशेष खोजी रिपोर्ट: जंगलों में खून-पसीना बहा रहे आदिवासियों के निवाले पर डाका; नियम कायदों को ताक पर रख चल रहा लाखों-करोड़ों का खेल

विशेष संवाददाता | [शहर/क्षेत्र का नाम]

​तेंदू पत्ता, जिसे जंगलों का 'हरा सोना' कहा जाता है, आज वह कुछ रसूखदार ठेकेदारों, फड़ मुंशियों और वन विभाग के भ्रष्ट तंत्र के लिए अवैध कमाई की 'खदान' बन चुका है। कड़कड़ाती धूप और झुलसा देने वाली गर्मी में मीलों पैदल चलकर पत्ता तोड़ने वाले गरीब आदिवासियों के हक पर 'पचहोत्रा' के नाम पर सरेआम डाका डाला जा रहा है। कागजों पर आदिवासियों के उत्थान के बड़े-बड़े दावे करने वाले सिस्टम की नाक के नीचे हर सीजन में लाखों-करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा हो रहा है, और गरीबों के मुंह से उनका निवाला छीना जा रहा है।

क्या है 'पचहोत्रा' और कैसे बनता है यह लूट का हथियार?

​नियमों के मुताबिक, तेंदू पत्ता संग्रहण के दौरान पत्तों की छंटनी, बंडल (चिट्टा) बनाने, उनके रख-रखाव और परिवहन के दौरान होने वाले संभावित नुकसान के प्रबंधन के लिए 'पचहोत्रा' (एक प्रकार की मानक कटौती या कमीशन व्यवस्था) का प्रावधान किया गया था। लेकिन ज़मीन पर आते-आते यह प्रावधान आदिवासियों को प्रताड़ित करने का सबसे बड़ा हथियार बन गया है।

​संग्रहण केंद्रों (फड़ों) पर जैसे ही कोई गरीब ग्रामीण पत्तों का बंडल लेकर पहुंचता है, मुंशी और बिचौलिए सक्रिय हो जाते हैं। पत्तों की गुणवत्ता खराब होने या आकार छोटा होने का बहाना बनाकर 'पचहोत्रा' के नाम पर जबरन कटौती की जाती है।

लूट का 'क्रोनोलॉजी': ऐसे गायब होते हैं करोड़ों रुपये

  • गिनती में हेराफेरी: संग्राहक अगर 100 गड्डी (मानक बोरा तय करने के लिए) लाता है, तो पचहोत्रा और छंटनी के नाम पर कागजों में केवल 75 या 80 गड्डी ही दर्ज की जाती है। बची हुई 20-25 गड्डियों का पैसा सीधे बिचौलियों की जेब में जाता है।
  • दोहरी कमाई का खेल: जिस माल को 'खराब' बताकर पचहोत्रा के नाम पर आदिवासियों से बिना पैसे दिए रख लिया जाता है, बाद में उसी माल को अच्छे पत्तों के साथ मिलाकर ऊंचे दामों पर व्यापारियों को ब्लैक में बेच दिया जाता है।
  • नकद भुगतान में कटौती: कई दूरदराज के इलाकों में आज भी बैंक खातों के बजाय नकद या आंशिक भुगतान का खेल चलता है, जहाँ अंगूठा पूरे पैसे पर लगवाया जाता है और हाथ में 'पचहोत्रा' काटकर आधी-अधूरे पैसे थमा दिए जाते हैं।

खून-पसीना आदिवासी का, मलाई खा रहा सिंडिकेट

​एक मानक बोरा तेंदू पत्ता इकट्ठा करने में एक पूरे आदिवासी परिवार की कई दिनों की हाड़-तोड़ मेहनत लगती है। सुबह 4 बजे से लेकर दोपहर तक जंगल में जहरीले जीव-जंतुओं के साये में भटकने के बाद ये पत्ते हाथ आते हैं। सरकार हर साल इसकी सरकारी कीमत (मानक दर) बढ़ाती तो है, लेकिन धरातल पर इस बढ़ी हुई कीमत का फायदा आदिवासियों से ज्यादा इस भ्रष्टाचार के 'सिंडिकेट' को मिल रहा है। जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो हर सीजन में पचहोत्रा के नाम पर काटा गया माल करोड़ों रुपयों के घोटाले का रूप ले लेता है।

जांच के नाम पर सिर्फ लीपापोती

​स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार इसकी शिकायत वन विभाग के आला अधिकारियों और जिला प्रशासन से की है। लेकिन ढाक के तीन पात, जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है। शिकायत के बाद जांच करने आने वाले अधिकारी खुद फड़ मुंशियों और ठेकेदारों की गाड़ियों में घूमते नजर आते हैं। नतीजा यह होता है कि शिकायत करने वाले गरीब आदिवासी को ही अगली बार फड़ पर प्रताड़ित किया जाता है और उसका माल लेने से मना कर दिया जाता है।


Comments

Popular posts from this blog

जनपद पंचायत कटनी में वर्षों से जमे रोजगार सहायक, तबादलों पर प्रशासन की चुप्पी

मध्यप्रदेश में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल तपस्या परिहार कटनी की नई निगमायुक्त, शिशिर गेमावत का भी तबादला, शासन ने किया बड़ा प्रशासनिक फेरबदल कई IAS अधिकारियों के तबादले

बड़ी खबर- कटनी जिला उद्योग विभाग मे फर्जीवाड़े की खुलने लगी परते