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 सूत्र के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार 

वन भूमि पर 'महाकब्जा'

कटनी में पोंसरा पंचायत की 10 से ज्यादा एकड़ वन भूमि का 'चीरहरण'; 20 साल से जमे रसूखदार ने काट डाले जंगल, तमाशा देख रहा फॉरेस्ट महकमा!

विशेष विशेष 

जिले के वन क्षेत्रों में भू-माफियाओं और सरकारी तंत्र की साठगांठ का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पर्यावरण संरक्षण के दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। तहसील के ग्राम पोंसरा पंचायत क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली करोड़ों रुपये की शासकीय वन भूमि पर एक रसूखदार द्वारा न केवल अवैध कब्जा किया गया, बल्कि हरे-भरे जंगलों को साफ कर वहां आलीशान साम्राज्य खड़ा कर लिया गया है। इस पूरे खेल में वन विभाग के स्थानीय अमले की भूमिका गंभीर सवालों के घेरे में है।

20 सालों का 'साम्राज्य' और रसूख का खेल

​सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे अवैध खेल के केंद्र में वह रसूखदार व्यक्ति है जो पिछले लगभग 20-22 सालों से क्षेत्र की तेंदू पत्ता खरीदी समिति में प्रबंधक के पद पर कुंडली मारकर बैठा है। दो दशकों से एक ही महत्वपूर्ण व्यवस्था से जुड़े होने के कारण इस व्यक्ति की जड़ें प्रशासनिक गलियारों और वन विभाग में इस कदर गहरी हो चुकी हैं कि कानून भी इसके आगे बौना साबित हो रहा है। आरोप है कि इसी रसूख की आड़ में हरा पंचायत की लगभग 10 एकड़ से अधिक वन भूमि (जो राजस्व और वन रिकॉर्ड में 'छोटे झाड़ के जंगल' के रूप में दर्ज है) को निशाना बनाया गया।

करोड़ों की लकड़ी बेची, वन भूमि को बना दिया 'निजी जागीर'

​अवैध कब्जे की यह कहानी किसी सोची-समझी साजिश से कम नहीं है। प्रत्यक्षदर्शियों और सूत्रों का दावा है कि सर्वप्रथम खसरा क्रमांक 33 और उससे जुड़ी वन भूमि पर स्थित कीमती पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की गई। लाखों-करोड़ों रुपये की इस बेशकीमती लकड़ी को अवैध रूप से बाजार में खपा दिया गया। जंगलों को समतल करने के बाद, उस सरकारी जमीन पर धड़ल्ले से खेती शुरू कर दी गई। इतना ही नहीं, वन विभाग की छाती पर बकायदा एक आलीशान मकान का निर्माण भी करा लिया गया, जो आज वन विभाग की लाचारी और भू-माफिया के हौसलों के प्रतीक के रूप में सीना ताने खड़ा है।

सवाल: क्या बिना 'मेहरबानी' के यह मुमकिन है?

​इस पूरे घटनाक्रम ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जनता के मन में कुछ सुलगते हुए सवाल हैं, जिनका जवाब महकमे को देना ही होगा:

  1. क्या यह संभव है कि 10 एकड़ की भारी-भरकम वन भूमि पर पेड़ कटते रहे, जेसीबी चलती रही, आलीशान मकान बनता रहा और बीट गार्ड से लेकर रेंजर तक को भनक तक नहीं लगी?
  2. 20-22 साल से एक ही समिति में जमे इस प्रबंधक पर आखिर वन विभाग के कुछ चुनिंदा अधिकारी और कर्मचारी इस कदर मेहरबान क्यों हैं?
  3. क्या यह मौन सहमति किसी बड़े 'मासिक नजराने' या भ्रष्टाचार के गठजोड़ का नतीजा है?
  4. नाम का खुलासा जल्द, खलबली मची:

    इस महाघोटाले और अवैध कब्जे के मुख्य सूत्रधार का नाम लगभग साफ हो चुका है। विभागीय साठगांठ के पुख्ता दस्तावेजों और कड़ियों को जोड़ा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि बहुत जल्द इस 'सफेदपोश' भू-माफिया के नाम का मय सबूत खुलासा किया जाएगा, जिससे वन विभाग के कई बड़े चेहरों के बेनकाब होने की पूरी उम्मीद है। फिलहाल, इस खबर के बाद से ही स्थानीय स्तर पर हड़कंप का माहौल है।


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