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आखिर कौन कर रहा है पोंसरा के फॉरेस्ट की जमीनो पर अवैध कब्जा  'वन' का 'उपवन' बना रहे भू-माफिया

ग्राम पंचायत पोंसरा फॉरेस्ट विभाग की बेशकीमती जमीन पर अवैध कब्जों का खेल; क्या 'रक्षक' ही बन गए हैं 'भक्षक'?

​व्यूरो चीफ कटनी 

​सरकार एक तरफ पर्यावरण संरक्षण के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है, वहीं दूसरी तरफ ग्राम पंचायत पोंसरा में वन विभाग की लापरवाही और कथित मिलीभगत के कारण करोड़ों रुपये की बेशकीमती सरकारी जमीन भू-माफियाओं के हवाले हो रही है। पोंसरा के जंगलों और वन विभाग की आरक्षित भूमि पर धड़ल्ले से हो रहे अवैध निर्माण और कब्जे ने अब कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

​सबसे बड़ा सवाल यह है कि नाक के नीचे हो रहे इस खेल से क्या वन विभाग वाकई बेखबर है, या फिर इस "महा-लूट" में विभाग की भी 'मूक सहमति' यानी मिलीभगत शामिल है?

रातों-रात बदल रही है जंगल की तस्वीर

​स्थानीय ग्रामीणों से मिली जानकारी और मौके के हालातों को देखें तो ग्राम पंचायत पोंसरा के वन क्षेत्र में बीते कुछ महीनों से अवैध कब्जों की बाढ़ आ गई है।

  • पेड़ों की कटाई: बेशकीमती पेड़ों को गुपचुप तरीके से काटकर जमीन को समतल किया जा रहा है।
  • पक्के निर्माण की कोशिश: कटीली तार फेंसिंग करने के साथ-साथ रातों-रात कच्चे-पक्के कमरों और बाउंड्री वॉल का निर्माण किया जा रहा है।
  • कमर्शियल इस्तेमाल की साजिश: सूत्रों की मानें तो इस बेशकीमती जमीन को भविष्य में ऊंचे दामों पर बेचने या कमर्शियल इस्तेमाल में लाने की बड़ी प्लानिंग चल रही है।

फॉरेस्ट विभाग की 'खामोशी' पर उठ रहे हैं सवाल

​इतने बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध कब्जे को लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि जब भी कोई आम इंसान लकड़ी काटने या छोटी-मोटी गतिविधि के लिए जंगल में जाता है, तो वन विभाग के कर्मचारी तुरंत डंडा लेकर पहुंच जाते हैं। लेकिन जब भू-माफिया जेसीबी (JCB) चलाकर पूरी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं, तब विभाग को सांप सूंघ जाता है।

ग्रामीणों की जुबानी:

"हैरानी की बात है कि सब कुछ खुलेआम हो रहा है। रेंजर और बीट गार्ड्स को कई बार सूचना दी गई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई जाती है। ऐसा लगता है कि ऊपर से नीचे तक सब 'मैनेज' है।"

क्या विभाग की 'मिलीभगत' से हो रहा है यह खेल?

​इस पूरे मामले में फॉरेस्ट विभाग की भूमिका पूरी तरह से संदिग्ध नजर आती है। जानकारों का कहना है कि बिना स्थानीय वनकर्मियों (Forest Guards) और बड़े अधिकारियों की शह के, कोई भी व्यक्ति वन विभाग की एक इंच जमीन पर भी पैर नहीं रख सकता। ऐसे में पोंसरा की करोड़ों की जमीन पर अवैध कब्जे होना सीधे तौर पर विभाग की 'मिलीभगत' या 'मूक सहमति' की ओर इशारा करता है।

​अवैध कब्जा करने वालों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें न तो कानून का डर है और न ही प्रशासन का। यह तभी मुमकिन है जब पीठ पर किसी रसूखदार और विभागीय अधिकारी का हाथ हो।

मामले के मुख्य बिंदु जिन पर जांच होना जरूरी:

  1. सीमांकन (Demarcation) की कमी: वन विभाग ने अपनी जमीन का स्पष्ट सीमांकन क्यों नहीं किया, जिससे माफियाओं को मौका मिला?
  2. शिकायतों पर लीपापोती: अब तक मिली शिकायतों पर विभाग ने क्या ठोस कानूनी कार्रवाई (FIR या बेदखली) की?
  3. कॉल डिटेल्स की जांच: संदिग्ध वनकर्मियों और क्षेत्र के भू-माफियाओं के बीच के गठजोड़ को उजागर करने के लिए उच्च स्तरीय जांच की जरूरत है।

जिम्मेदारों का क्या है कहना?

इस संबंध में स्थानीय अधिकारियो से संपर्क का प्रयास किया जा रहा है 

 उच्च स्तरीय जांच की दरकार

​ग्राम पंचायत पोंसरा में प्रकृति और सरकारी खजाने, दोनों को लूटा जा रहा है। अगर समय रहते जिला प्रशासन और वन विभाग के उच्च अधिकारियों ने इस मामले में दखल नहीं दिया, तो पोंसरा का यह हरा-भरा वन क्षेत्र सिर्फ कागजों पर ही सिमट कर रह जाएगा। इस मामले में न सिर्फ अवैध कब्जाधारियों पर, बल्कि उन्हें शह देने वाले वन विभाग के भ्रष्ट चेहरों पर भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

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