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जनसुनवाई: जहां शिकायतें तो दर्ज होती हैं, पर समाधान 'लापता' है! शिकायते आने के आकडो का हिसाब पर निपटारे का प्रकाशन क्यो नही?
विशेष ब्यूरो | कटनी
'आंकड़ों की बाजीगरी' में उलझा आम आदमी, केवल रसीद थमा देने से नहीं होता न्याय।
सरकारें बड़े ढिंढोरा पीटकर 'जनसुनवाई' के मंच सजाती हैं। हर हफ्ते अधिकारियों की गाड़ियां कतार में खड़ी होती हैं, चमचमाती कुर्सियां लगती हैं और जनता की समस्याओं का 'पुलिंदा' तैयार किया जाता है। प्रशासन बड़े गर्व से हर महीने आंकड़े जारी करता है—"इस महीने 5,000 शिकायतें दर्ज हुईं!"
लेकिन सवाल यह है कि इस 'दर्ज' होने के खेल के पीछे का सच क्या है? जितने उत्साह और अनिवार्य नियम के साथ शिकायतों का हिसाब रखा जाता है, उतने ही अनिवार्य नियम के साथ 'कितनी शिकायतों का वास्तविक निपटारा हुआ', उसका प्रकाशन क्यों नहीं किया जाता? क्या जनसुनवाई का मकसद सिर्फ शिकायतों की गिनती बढ़ाना है या पीड़ित को न्याय दिलाना?
रसीद की 'सांत्वना' और अंतहीन इंतजार
जनसुनवाई में जाने वाले किसी भी आम नागरिक से पूछिए। वह अपनी गाढ़ी कमाई का किराया फूंककर, चिलचिलाती धूप में लाइन लगाकर साहब के सामने अर्जी रखता है। उसे एक कंप्यूटर जनित नंबर या रसीद थमा दी जाती है। बस, यहीं से शुरू होता है अंतहीन इंतजार का अंतहीन सिलसिला।
कड़वा सच: शिकायत दर्ज होना प्रशासनिक सफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था की नाकामी का सुबूत है कि लोग परेशान हैं। असली सफलता तो इस बात में है कि उन शिकायतों में से कितनों को कूड़ेदान में फेंकने के बजाय उनका समाधान किया गया।
पारदर्शिता के नाम पर सिर्फ 'एकतरफा' हिसाब क्यों?
यदि प्रशासन में रत्ती भर भी ईमानदारी और पारदर्शिता बची है, तो नियम यह होना चाहिए:
- जितनी हेडलाइंस शिकायतें दर्ज होने की बनती हैं, उतनी ही बड़ी हेडलाइंस 'निपटारे' की भी बनें।
- हर कलेक्ट्रेट और तहसील के बाहर एक 'सच्चाई का ब्लैकबोर्ड' या डिजिटल डिस्प्ले होना चाहिए, जो बताए कि पिछले हफ्ते आईं 100 शिकायतों में से कितनी फाइलें बंद हुईं और कितने लोगों को उनका हक मिला।
- 'निपटारे' का मतलब सिर्फ संबंधित विभाग को फाइल 'फॉरवर्ड' कर देना नहीं होना चाहिए, बल्कि शिकायतकर्ता की संतुष्टि होना चाहिए।
अधिकारियों की 'फॉरवर्ड-फॉरवर्ड' की बीमारी
आज जनसुनवाई का कड़वा सच यह बन चुका है कि बड़े साहब शिकायत सुनते हैं और उस पर मार्क करके छोटे साहब को भेज देते हैं। छोटे साहब उसे बाबू को दे देते हैं। बाबू उसे ठंडे बस्ते में डाल देता है। अगली जनसुनवाई में पीड़ित फिर पहुंचता है, तो उसे मालूम पड़ता है कि उसकी अर्जी 'प्रक्रिया' में है।
हमारा सीधा सवाल: क्या प्रशासन के पास ऐसी कोई व्यवस्था है कि जनसुनवाई के नाम पर जनता के टैक्स का जो पैसा और समय बर्बाद हो रहा है, उसका 'सफलता दर' (Success Rate) क्या है?
अब आर-पार की बात: अनिवार्य हो 'समाधान' का प्रकाशन
लोकतंत्र में जनता जनार्दन है, कोई याचक नहीं। यदि सरकारें वाकई गंभीर हैं, तो शिकायतों के पंजीकरण की तरह ही 'शिकायत निवारण रिपोर्ट' (Grievance Redressal Report) का प्रकाशन भी कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाए। जनता को यह जानने का पूरा हक है कि जिस जनसुनवाई को 'रामबाण' बताया जाता है, वह कहीं केवल एक 'सरकारी इवेंट' बनकर तो नहीं रह गई है।
जब तक समाधान के आंकड़े सार्वजनिक नहीं होंगे, तब तक जनसुनवाई सिर्फ एक ढोंग रहेगी—जहाँ फरियादी अपनी फरियाद लेकर आता तो उम्मीद के साथ है, पर लौटता सिर्फ एक कोरे कागज के टुकड़े के साथ है। अब कागजी आंकड़े बंद करो, जमीन पर समाधान दिखाओ!
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