Chief editor-neeraj pandey
प्रशासनिक सुस्ती या मिलीभगत? हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी कैलवारा खुर्द में नहीं ढहाए गए अवैध निर्माण
कटनी। एक ओर जहाँ प्रदेश सरकार सरकारी जमीनों से अतिक्रमण हटाने के लिए 'जीरो टॉलरेंस' की नीति का दावा करती है, वहीं जनपद पंचायत कटनी की ग्राम पंचायत कैलवारा खुर्द में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। हाईकोर्ट के आदेश और पंचायतों के प्रतिवेदन के बावजूद, खसरा नंबर 326/2 और शासकीय माध्यमिक शाला की भूमि पर बनी अवैध दुकानें आज भी सीना ताने खड़ी हैं।
हाईकोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखा रहा तहसील कार्यालय
सूत्रों के अनुसार, इन अवैध दुकानों को पूर्व में माननीय उच्च न्यायालय के आदेश पर तोड़ा गया था। न्यायालय के आदेश की प्रति तहसील कार्यालय में जमा होने के बावजूद तहसीलदार अवन्तिका तिवारी और राजस्व विभाग की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। सवाल यह उठता है कि जब ग्राम पंचायत और जनपद पंचायत कटनी द्वारा 23 अप्रैल 2026 को ही स्पष्ट प्रतिवेदन सौंपा जा चुका है, तो फाइल तहसील कार्यालय की धूल क्यों फांक रही है?
उपसरपंच पर कब्जा करने के आरोप, क्या शून्य होगा पद?
ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि इन अवैध दुकानों का निर्माण वर्तमान उपसरपंच भूषण पाठक द्वारा कराया गया है। पंचायती राज अधिनियम के अनुसार, यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि शासकीय भूमि पर अतिक्रमण करता है या अवैध गतिविधियों में संलिप्त पाया जाता है, तो उसका पद निरस्त (Disqualify) करने का प्रावधान है। बावजूद इसके, न तो अवैध निर्माण गिराया गया और न ही पद के दुरुपयोग पर कोई कार्रवाई शुरू हुई।
मुख्य बिंदु जो प्रशासन को कठघरे में खड़ा करते हैं:
- स्कूल की जमीन पर कब्जा: शासकीय माध्यमिक शाला रेसटी जैसे शैक्षणिक संस्थान की भूमि पर अतिक्रमण बच्चों के भविष्य और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है।
- दस्तावेजों की अनदेखी: 23/04/2026 को जनपद पंचायत से मिले प्रतिवेदन पर तहसीलदार की चुप्पी क्या किसी राजनीतिक दबाव का संकेत है?
- अदालत की अवमानना: हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में गिराई गई दुकानों का दोबारा बन जाना और फिर उन पर कार्रवाई न होना सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है।
ग्रामीणों में आक्रोश
कैलवारा खुर्द के ग्रामीणों का कहना है कि "जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और प्रशासन मूकदर्शक बना रहे, तो न्याय की उम्मीद किससे करें?" यदि शीघ्र ही इन दुकानों को नहीं ढहाया गया और दोषियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो ग्रामीण उग्र आंदोलन और उच्च अधिकारियों के घेराव के लिए बाध्य होंगे।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस 'निष्क्रियता' की नींद से कब जागता है या फिर रसूखदारों के आगे नियम-कायदे इसी तरह दबे रहेंगे।
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