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दीवारों तक सिमटा ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’, जमीनी हकीकत नदारद

कटनी/विजयराघवगढ जहां एक ओर “जल गंगा संवर्धन अभियान” के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। विजयराघवगढ़ विकासखंड के ग्राम देवराकला में अभियान के तहत दीवार लेखन तो किया गया, लेकिन यह महज औपचारिकता बनकर रह गया।

ग्रामीणों का कहना है कि दीवारों पर नारे लिखने से जल संकट का समाधान नहीं होने वाला। गांव में आज भी कई जल स्रोत उपेक्षा का शिकार हैं, जिनकी सफाई और पुनर्जीवन के लिए कोई ठोस कदम नजर नहीं आ रहा। छात्रों से नारे लिखवाकर प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली, जबकि वास्तविक जरूरत जल संरचनाओं के सुधार और रखरखाव की है।

‘जल है अनमोल’ जैसे संदेश दीवारों तक सीमित रह गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर न तो जल संरक्षण की कोई प्रभावी योजना दिख रही है और न ही उसका क्रियान्वयन। ग्रामीणों का आरोप है कि ऐसे अभियानों में सिर्फ दिखावा ज्यादा और काम कम होता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल दीवार लेखन से जल संरक्षण संभव है, या फिर यह अभियान भी अन्य योजनाओं की तरह कागजों तक ही सीमित रह जाएगा?

इनका कहना है 

स्वच्छता अभियान को लेकर प्रयास हो रहे हैं और वहां भी लोगों के साथ मिलकर कार्य किया जा रहा है लेकिन ग्रामीणों को भी सहयोग देना चाहिए सहयोग से कार्य सफल होते हैं

डॉक्टर तेजपाल सिंह जिला समन्वयक जन अभियान परिषद

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