बड़वारा-विजयराघवगढ़ में रेत पर ‘आधी’ कार्रवाई: ट्रैक्टरों पर गिरेगा गाज, तो हाइवा को किसका ‘राज’?
विशेष रिपोर्ट: पुलिस की मुस्तैदी पर उठते सवाल; क्या सिर्फ छोटे मोहरों पर कार्रवाई कर पल्ला झाड़ रहा प्रशासन?
कटनी। जिले के बड़वारा और विजयराघवगढ़ इलाके में इन दिनों अवैध रेत उत्खनन और परिवहन के खिलाफ पुलिस और खनिज विभाग की ‘ताबड़तोड़’ कार्रवाई चर्चा में है। रोजाना सुबह-शाम ट्रैक्टर-ट्रॉली पकड़े जाने की खबरें सरकारी प्रेस नोट की शोभा बढ़ा रही हैं। पुलिस मुस्तैद दिख रही है, अधिकारी पीठ थपथपा रहे हैं। लेकिन इस कथित ‘सख्त’ कार्रवाई के पीछे का एक स्याह पहलू अब जनता के बीच कौतूहल और आक्रोश का विषय बन चुका है।
सवाल सीधा है—क्या बड़वारा और विजयराघवगढ़ की नदियों का सीना सिर्फ ट्रैक्टर ही छलनी कर रहे हैं? क्या इन रास्तों से रेत से ओवरलोड होकर गुजरने वाले 'हाइवा' (भारी डंपर) गायब हो चुके हैं, या फिर उन्हें किसी ‘बड़े हाथ’ का अभयदान प्राप्त है?
तस्वीर का एक पहलू: सिर्फ ट्रैक्टर-ट्रॉली ही क्यों बनते हैं निशाना?
पिछले कुछ हफ्तों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो बड़वारा और विजयराघवगढ़ में जब्त किए गए वाहनों में शत-प्रतिशत संख्या ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की है। अमूमन ये वाहन स्थानीय ग्रामीणों या छोटे कारोबारियों के होते हैं।
- दिखावे की मुस्तैदी: छोटे वाहनों को पकड़कर प्रशासन अपनी पीठ थपथपा लेता है कि "अवैध रेत के खिलाफ जीरो टॉलरेंस है।"
- आसान शिकार: ट्रैक्टर चालकों के पास न तो रसूख होता है और न ही राजनैतिक संरक्षण, इसलिए इन्हें दबोचना सबसे आसान होता है।
- रसूखदारों का 'कवच': क्या इन हाइवा मालिकों को किसी रसूखदार नेता या रसूखदार सफेदपोश का संरक्षण प्राप्त है?
- 'सिस्टम' का मौन समर्थन: क्या नीचे से ऊपर तक कोई ऐसी अदृश्य सेटिंग है, जिसके चलते भारी वाहनों के आते ही जांच चौकियों की आंखें बंद हो जाती हैं?
- सिर्फ कागजी खानापूर्ति: बड़े मगरमच्छों को छूने से कतराना और छोटी मछलियों को पकड़कर अपनी कागजी कार्रवाई पूरी कर लेना, क्या यही महकमे की नई रणनीति है?
बड़ा सवाल: एक ट्रैक्टर-ट्रॉली में कम रेत आती है। वहीं, एक हाइवा में लगभग दस गुनी रेत लोड होती है। अगर सिर्फ ट्रैक्टर पकड़े जा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि बड़े पैमाने पर होने वाली लूट को खुली छूट मिली हुई है।
खोजी नजरिया: तो क्या हाइवा से नहीं हो रहा अवैध कारोबार?
स्थानीय सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो सच इसके ठीक उलट है। रात के अंधेरे में ही नहीं, बल्कि अलसुबह भी बड़वारा और विजयराघवगढ़ के कई अंचलों से रेत से लदे भारी-भरकम हाइवा सड़कों को रौंदते हुए निकलते हैं। लेकिन ताज्जुब की बात है कि आज तक एक भी हाइवा की जब्ती की खबर सामने नहीं आई।
इस विसंगति के पीछे तीन बड़े कयास लगाए जा रहे हैं:
जनता पूछ रही है तीखे सवाल
क्षेत्रीय नागरिकों का कहना है कि भारी हाइवा के कारण न सिर्फ सरकार को करोड़ों के राजस्व का चूना लग रहा है, बल्कि क्षेत्र की सड़कें भी गढ्ढों में तब्दील हो चुकी हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि "पुलिस और खनिज विभाग की कार्रवाई केवल 'कोटा' पूरा करने जैसी है। छोटे गरीबों के ट्रैक्टर पकड़ लिए जाते हैं, जिससे उनका रोजगार छिन जाता है, जबकि हाइवा वाले रसूखदार शान से मलाई काट रहे हैं।"
निष्पक्षता की कसौटी पर प्रशासन
अगर प्रशासन वाकई अवैध उत्खनन को जड़ से खत्म करना चाहता है, तो उसे अपनी इस 'चुनिंदा' कार्रवाई के ढर्रे को बदलना होगा। जब तक रेत के खेल के बड़े खिलाड़ियों और उनके हाइवा पर कानूनी चाबुक नहीं चलेगा, तब तक बड़वारा और विजयराघवगढ़ में चल रही इस मुस्तैदी को जनता 'दिखावा' ही समझेगी।
अब देखना यह है कि इस गंभीर सवाल के बाद क्या कटनी पुलिस और जिला प्रशासन के आला अधिकारी इन 'रसूखदार हाइवा' चालकों पर शिकंजा कसने की हिम्मत जुटा पाते हैं, या फिर रेत का यह 'आधा-अधूरा' खेल यूं ही चलता रहेगा।

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