जब पत्रकार ही करने लगे पत्रकारों की शिकायत…

जब पत्रकार ही रचने लगें पत्रकारों को फंसाने की साजिश…

जब कलम के सिपाही ही खींचने लगें एक-दूसरे की टांग…

तो आखिर सच का आईना कौन दिखाएगा?

क्या ये लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए खतरे की घंटी है?

आइए, देखते हैं ये खास रिपोर्ट…

पत्रकारिता… जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है।

जिसका काम है सच को सामने लाना, समाज को जागरूक करना और सत्ता से सवाल करना।

लेकिन जब यही पत्रकार एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होने लगें, तो सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर इस पेशे की दिशा क्या हो रही है?

पत्रकारों के आपसी विवाद, शिकायतें, आरोप-प्रत्यारोप के विजुअल

हाल के समय में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहाँ पत्रकार ही पत्रकारों के खिलाफ शिकायत दर्ज करा रहे हैं।

कहीं व्यक्तिगत द्वेष, तो कहीं प्रतिस्पर्धा की होड़…

और कहीं नाम और पहचान की लड़ाई—इन सबने पत्रकारिता की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

विशेषज्ञ/वरिष्ठ पत्रकारो  का कहना है कि 

“पत्रकारों के बीच मतभेद होना सामान्य है, लेकिन जब यह व्यक्तिगत दुश्मनी और साजिश में बदल जाए, तो इसका सीधा असर समाज और मीडिया की विश्वसनीयता पर पड़ता है।”

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पत्रकार ही एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा करेंगे, तो आम जनता किस पर भरोसा करेगी?

क्योंकि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है—निष्पक्षता, पारदर्शिता और सच्चाई।

जनता की राय 

“अगर पत्रकार ही आपस में लड़ेंगे, तो हमें सही खबर कैसे मिलेगी?”

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाओं से समाज में भ्रम की स्थिति पैदा होती है।

लोगों का मीडिया पर विश्वास कम होता है और झूठी खबरों को बढ़ावा मिल सकता है।

तो सवाल यही है—

क्या पत्रकारों को अपने मूल कर्तव्यों की ओर लौटने की जरूरत है?

क्या कलम के सिपाहियों को एकजुट होकर सच की लड़ाई लड़नी चाहिए, ना कि एक-दूसरे के खिलाफ?

क्योंकि अगर सच दिखाने वाले ही बिखर गए…

तो समाज को सही दिशा कौन देगा?

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