जनपद पंचायत कटनी में अफसरशाही की तानाशाही, लोकतंत्र के मूल्यों को खुली चुनौती

Chief editor-neeraj pandey 

जनपद पंचायत कटनी में अफसरशाही की तानाशाही, लोकतंत्र के मूल्यों को खुली चुनौती

 सूत्रों के हवाले से -जनपद पंचायत कटनी में पदस्थ   SDO AE अभिषेक त्रिपाठी द्वारा एक ऐसा फरमान जारी किया गया है, जिसने पंचायत राज व्यवस्था और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एसडीओ एई अभिषेक त्रिपाठी का कहना है कि “मुझसे केवल सरपंच और सचिव ही मिल सकते हैं, मैं किसी पंच या आम नागरिक से मिलने के लिए बाध्य नहीं हूँ।”

यह बयान न केवल पंचों के संवैधानिक अधिकारों का अपमान है, बल्कि आम जनता के साथ सीधे-सीधे भेदभाव भी है।

सीईओ की समझाइश भी बेअसर, तानाशाही बरकरार

 विश्वसनीय सूत्रों ने बताया कि  इस तुगलकी फरमान की शिकायत पहले ही जनपद पंचायत कटनी के सीईओ से की जा चुकी है।

बताया जाता है कि सीईओ ने इस पर नाराज़गी जताते हुए एसडीओ एई को समझाइश भी दी थी, लेकिन इसके बावजूद अभिषेक त्रिपाठी की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आया।

प्रशासन इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे बैठा है, जिससे सवाल उठता है—क्या अफसरशाही अब जवाबदेही से ऊपर हो चुकी है?

 ग्राम पंचायत बडेरा मैं नियमों की खुले आम धज्जियाँ उडाई जा रही है 

  जहाँ एक ओर ऐसे तानाशाही फरमान है वहीं दूसरी ओर इसी अधिकारी के कार्यक्षेत्र में आने वाली  बडेरा  ग्राम पंचायत में एक और गंभीर मामला सामने आया है।

यहाँ एक महिला सचिव सरिता तिवारी के स्थान पर उनका पति रामगोपाल तिवारी पिछले लगभग एक वर्ष से पंचायत का पूरा कामकाज संभाल रहा है।

महिला सचिव के बीमार होने का यह अर्थ कतई नहीं हो सकता कि उसका पति गैरकानूनी तरीके से सचिव बनकर—

समस्त वित्तीय लेन-देन करे

पंचायत के संवेदनशील दस्तावेज़ों पर अधिकार जमाए

और सरकारी नियमों को ताक पर रख दे

इसके बावजूद न तो एसडीओ एई की ओर से कोई कार्रवाई हुई और न ही प्रशासन ने कोई संज्ञान लिया।

कानून सिर्फ गरीबों के लिए? अब सवाल यह उठता है कि—

क्या कानून केवल गरीब, असहाय और अनपढ़ लोगों के लिए ही बनाए गए हैं?

क्या रसूखदारों और अफसरों के सामने नियम बौने हो जाते हैं?

जनपद पंचायत कटनी में जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, वह यही संकेत देती है कि यहाँ नियमों से ज़्यादा अफसरों की मर्जी चल रही है।

प्रशासन से सवाल, जनता जवाब चाहती है

इस पूरे प्रकरण ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

अब देखना यह होगा कि क्या जिला प्रशासन और उच्च अधिकारी इस तानाशाही रवैये और खुले नियम उल्लंघन पर कोई ठोस कार्रवाई करते हैं,

या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।


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