ग्राम का राजा सरपंच, लेकिन सत्ता सचिव के हाथ क्यों?”

Chief Editor- Neeraj Pandey 

ग्राम का राजा सरपंच, लेकिन सत्ता सचिव के हाथ क्यों?”


संविधान ने ग्राम पंचायत को लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव बताया है। गांव का मुखिया सरपंच होता है, जिसे जनता सीधे चुनती है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

अगर ग्राम का राजा सरपंच है, तो फिर सचिव के बिना कोई भी काम क्यों नहीं होता?

फाइल हो या भुगतान, प्रस्ताव हो या विकास कार्य—हर जगह एक ही नाम सामने आता है, पंचायत सचिव।

हकीकत

गांवों में हालात यह हैं कि सरपंच सिर्फ नाम के मुखिया बनकर रह गए हैं। पंचायत की बैठक हो या विकास योजना की स्वीकृति—सब कुछ सचिव की मर्जी से चलता है। बिना सचिव के हस्ताक्षर के न तो काम शुरू होता है और न ही भुगतान।

स्थानीय सरपंचों का कहना है कि सचिव पंचायतों को चला रहे हैं, जबकि सरपंचों की भूमिका केवल दस्तखत करने तक सीमित कर दी गई है। कई जगह तो सचिव महीनों तक पंचायत में उपस्थित नहीं रहते, फिर भी पूरा सिस्टम उन्हीं के भरोसे चलता है।

सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि कमजोर क्यों हैं?

क्या प्रशासनिक नियंत्रण के नाम पर लोकतंत्र को कुचला जा रहा है?

क्या पंचायत राज व्यवस्था में सुधार सिर्फ कागजों तक सीमित है?

जब तक सरपंच को वास्तविक अधिकार नहीं मिलेंगे और सचिवों की मनमानी पर रोक नहीं लगेगी, तब तक गांव का विकास सिर्फ फाइलों में ही दौड़ता रहेगा।

सच्चाई

गांव का राजा अगर सरपंच है, तो शासन उसी के हाथ में होना चाहिए—

वरना सवाल यही रहेगा…

ग्राम पंचायत चला कौन रहा है—जनता का प्रतिनिधि या सरकारी बाबू?


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