महानदी का छलनी होता सीना
Chief editor -Neeraj Pandey
महानदी का खत्म होता अस्तित्व
रेत उत्खनन से पर्यावरण पर गहराता संकट, प्रशासन की भूमिका सवालों के घेरे में
महानदी, जो कभी क्षेत्र की जीवनरेखा कही जाती थी, आज रेत उत्खनन की भेंट चढ़ती दिखाई दे रही है। नदी के भीतर और किनारों पर लगातार हो रही खुदाई ने उसके प्राकृतिक स्वरूप को बिगाड़ दिया है। अवैध ही नहीं, बल्कि कई स्थानों पर वैध अनुमति के नाम पर भी तय मानकों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार रेत खनन के लिए निर्धारित गहराई और क्षेत्रफल का पालन नहीं हो रहा। भारी मशीनों के उपयोग से नदी की धारा प्रभावित हो रही है, जिससे किनारों पर कटाव बढ़ रहा है। परिणामस्वरूप आसपास की कृषि भूमि खतरे में है और कई स्थानों पर भू-धंसाव की स्थिति बन रही है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक रेत उत्खनन से भूजल स्तर तेजी से गिरता है। नदी के नीचे प्राकृतिक रूप से होने वाला जल-संचय बाधित हो जाता है, जिसका सीधा असर पेयजल व्यवस्था पर पड़ता है। साथ ही जलीय जीव-जंतुओं का अस्तित्व भी संकट में आ गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार प्रशासन को शिकायतें दीं, लेकिन प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। दिन और रात के अंतर के बिना रेत से लदे वाहनों की आवाजाही जारी है। इससे न केवल सड़कें क्षतिग्रस्त हो रही हैं, बल्कि दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ गया है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि खनन नियमों के अनुसार हो रहा है, तो फिर पर्यावरणीय संतुलन क्यों बिगड़ रहा है? क्या निगरानी तंत्र कमजोर है, या फिर नियम केवल कागज़ों तक रह गए हैं?
यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो इसके दूरगामी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि भविष्य में बाढ़ और जल संकट की स्थिति और गंभीर हो सकती है।
महानदी को बचाना केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। अब आवश्यकता है पारदर्शी जांच, सख्त निगरानी और दोषियों पर ठोस कार्रवाई की—ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह नदी केवल इतिहास न बन जाए।

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