*धान खरीदी : व्यवस्था के नाम पर संगठित लूट*
*धान खरीदी : व्यवस्था के नाम पर संगठित लूट*
कटनी जिले में समर्थन मूल्य पर चल रही धान खरीदी अब किसानों के हित की योजना नहीं, बल्कि संगठित फर्जीवाड़े और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बनती जा रही है। जिस व्यवस्था का उद्देश्य मेहनतकश किसानों को राहत देना था, वही व्यवस्था आज व्यापारियों, बिचौलियों और कुछ जिम्मेदार कर्मचारियों के लिए कमाई का खुला मंच बन चुकी है।
जिले में धान खरीदी के नाम पर जो तस्वीर उभरकर सामने आ रही है, वह बेहद चिंताजनक है। किसान बनकर सामने आ रहे लोग वास्तव में व्यापारी हैं, जो थोड़ी-सी स्वयं की जमीन दिखाकर शेष भूमि को सिकमी नामा (किराए की जमीन) बताकर पंजीयन करा रहे हैं। विडंबना यह है कि जिन किसानों की जमीन का किरायानामा दिखाया जा रहा है, उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं है। यह स्थिति सीधे-सीधे फर्जी दस्तावेज़, फर्जी पंजीयन और शासन से धोखाधड़ी की ओर इशारा करती है।
और भी गंभीर तथ्य तब सामने आते हैं जब कागज़ों में दर्शाई गई 10–15 एकड़ कृषि भूमि का भौतिक सत्यापन किया जाता है। कई मामलों में उन जमीनों पर धान की फसल तो दूर, लिपटिस के पेड़ खड़े हैं, पहाड़ी क्षेत्र है या पूरी तरह बंजर भूमि है। प्रश्न यह है कि ऐसी भूमि पर पैदा हुआ धान आखिर किस खेत से आया? इसका सीधा उत्तर है — यह धान वास्तविक किसानों का नहीं, बल्कि व्यापारियों का है, जिसे सरकारी तंत्र की कमजोरी का लाभ उठाकर समर्थन मूल्य पर खपाया जा रहा है।
यह खेल अकेले नहीं खेला जा सकता। फर्जी पंजीयन, संदिग्ध सिकमी नामे और कागज़ी खेती के पीछे कंप्यूटर ऑपरेटरों, संबंधित कर्मचारियों और प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत की बू साफ महसूस होती है। यदि पंजीयन स्तर पर सख़्ती होती, तो यह फर्जीवाड़ा जिले भर में फैल ही नहीं सकता था।
सवाल केवल आर्थिक नुकसान का नहीं है, बल्कि विश्वास के टूटने का है। असली किसान कतारों में भटकते हैं, तौल में कटौती सहते हैं और भुगतान के लिए परेशान होते हैं, जबकि व्यापारी कागज़ों के सहारे शासन को करोड़ों का चूना लगाकर आराम से निकल जाते हैं। यह स्थिति शासन की मंशा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
अब समय आ गया है कि इस मामले को केवल विभागीय जांच तक सीमित न रखा जाए। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) से वित्तीय फर्जीवाड़े की, लोकायुक्त संगठन से कर्मचारियों की भूमिका की और राजस्व विभाग से भूमि व फसल सत्यापन की समग्र जांच कराई जाए। साथ ही दोषियों के विरुद्ध IPC की गंभीर धाराओं में एफआईआर, गिरफ्तारी और अवैध लाभ की वसूली सुनिश्चित की जाए।
यदि अब भी कठोर कार्रवाई नहीं होती, तो यह मानना पड़ेगा कि धान खरीदी में चल रहा यह फर्जीवाड़ा किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की मौन सहमति से चल रहा अपराध है। शासन को तय करना होगा कि वह किसानों के साथ खड़ा है या फिर माफियाओं के।

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